तिरुवनंतपुरम: आज जब हम महिला सशक्तिकरण और समानता की बात करते हैं, तो भारत के ही एक राज्य केरल के इतिहास में एक ऐसा पन्ना भी दर्ज है जो रोंगटे खड़े कर देता है। यह कहानी है ‘मुलक्करम’ यानी ब्रेस्ट टैक्स की, जिसके खिलाफ एक साधारण महिला नंगेली ने ऐसा विद्रोह किया जिसकी गूँज आज 200 साल बाद भी राजनीति और समाज में सुनाई देती है।
केरल के त्रावणकोर साम्राज्य में निचली जाति की महिलाओं को अपने शरीर का ऊपरी हिस्सा ढंकने की अनुमति नहीं थी। यदि कोई महिला शालीनता के लिए वस्त्र पहनना चाहती, तो उसे इसके बदले सरकार को टैक्स चुकाना पड़ता था।

20वीं सदी शुरुआत तक भी केरलम की कई जातियों में महिलाएं स्तन नहीं ढंकती थीं। तस्वीर थिय्या समुदाय के एक परिवार की। (Courtesy: George J Thaliath Foundation)
क्या था मुलक्करम या ब्रेस्ट टैक्स?
18वीं और 19वीं शताब्दी के दौरान त्रावणकोर में जाति व्यवस्था अपने सबसे क्रूर रूप में थी। ब्राह्मणों और शासकों के सामने निचली जाति की महिलाओं (एझावा, नादर, थिया) के लिए नियम था कि वे अपनी नाभि से ऊपर कोई कपड़ा नहीं पहन सकती थीं।
इतिहासकारों के अनुसार, उस समय लगभग 120 प्रकार के टैक्स वसूले जाते थे, जिनमें से ब्रेस्ट टैक्स सबसे अपमानजनक था। टैक्स की राशि महिला के स्तनों के आकार के आधार पर तय की जाती थी। यदि कोई महिला सवर्णों के सामने कपड़े पहनकर आती, तो राजपुरोहित या अधिकारी डंडे में बंधे चाकू से उनके वस्त्र फाड़ देते थे।
नंगेली का ऐतिहासिक विद्रोह और बलिदान
साल 1803 में चेरथला नगर की रहने वाली नंगेली ने इस अमानवीय प्रथा के खिलाफ खड़े होने का फैसला किया। जब टैक्स कलेक्टर उसके घर पहुंचा, तो नंगेली ने पैसे देने के बजाय एक खौफनाक कदम उठाया। उसने झोपड़ी के भीतर जाकर अपने दोनों स्तन काट लिए और उन्हें एक केले के पत्ते पर रखकर कलेक्टर के सामने पेश कर दिया।
नंगेली का संदेश साफ था— “जब स्तन ही नहीं होंगे, तो टैक्स किस बात का।” अत्यधिक रक्तस्राव के कारण नंगेली की वहीं मौत हो गई। उनकी चिता पर उनके पति चिरुकंदन ने भी कूदकर जान दे दी, जिसे इतिहास में किसी पुरुष द्वारा ‘सती’ होने की पहली घटना माना जाता है।
चन्नार विद्रोह: जब कपड़ों के लिए छिड़ गई जंग
नंगेली की मौत ने एक बड़े आंदोलन को जन्म दिया, जिसे ‘चन्नार विद्रोह’ या ‘ऊपरी कपड़े का आंदोलन’ (Upper Cloth Revolt) कहा जाता है। महिलाओं ने अपनी गरिमा के लिए लड़ना शुरू किया। अपमान से बचने के लिए कई महिलाओं ने ईसाई धर्म अपना लिया ताकि वे चर्च जाते समय खुद को ढंक सकें।
सवर्णों ने इसका हिंसक विरोध किया, सार्वजनिक रूप से महिलाओं के कपड़े फाड़े गए और उन्हें प्रताड़ित किया गया। लेकिन यह संघर्ष थमा नहीं। आखिरकार, 26 जुलाई 1859 को त्रावणकोर के राजा ने आधिकारिक फरमान जारी कर सभी महिलाओं को शरीर ढंकने का अधिकार दिया।

केरलम में एक कार्यक्रम में नंगेली की यह मूर्ति बनाई गई थी। राज्य में नंगेली का कोई आधिकारिक स्मारक नहीं हैं, लेकिन इतिहासकारों और सामाजिक कार्यकर्ता लगातार इसकी मांग उठा रहे हैं।
आज की राजनीति पर इस इतिहास का असर
भले ही यह घटना सदियों पुरानी हो, लेकिन इसके जख्म आज भी केरल की राजनीति में जीवित हैं। केरल की 50 से अधिक विधानसभा सीटों पर एझावा और नादर समुदायों का बड़ा प्रभाव है। चुनाव के समय अक्सर ब्रेस्ट टैक्स और नंगेली के बलिदान का जिक्र सामाजिक न्याय और स्वाभिमान के प्रतीक के रूप में किया जाता है। आज भी नंगेली के लिए एक आधिकारिक स्मारक की मांग उठती रहती है।
अस्मिता की लड़ाई का अंत
नंगेली की कहानी हमें याद दिलाती है कि बुनियादी मानव अधिकारों और गरिमा के लिए हमारे पूर्वजों ने कितनी भारी कीमत चुकाई है। ब्रेस्ट टैक्स का अंत केवल एक कर की समाप्ति नहीं थी, बल्कि यह जातिवाद और पितृसत्ता के खिलाफ एक महान जीत थी।
नंगेली का बलिदान और केरल की राजनीति: क्या ‘मुलक्करम’ आज भी तय करता है हार-जीत? जानें 50 सीटों का सियासी समीकरण
केरल के सामाजिक इतिहास का एक काला अध्याय, मुलक्करम (स्तन कर), आज 223 साल बाद भी राज्य की चुनावी राजनीति में एक शक्तिशाली हथियार बना हुआ है। 1803 में चेरथला की एक साहसी महिला ‘नंगेली’ द्वारा अपनी अस्मिता के लिए दिए गए आत्म-बलिदान की कहानी को आज वामपंथी और दक्षिणपंथी दल अपने-अपने नैरेटिव के हिसाब से इस्तेमाल कर रहे हैं।
केरल की 50 से अधिक विधानसभा सीटों पर इस ऐतिहासिक संघर्ष का प्रतीकात्मक असर साफ देखा जा सकता है, जहाँ जातिगत गौरव और ऐतिहासिक अन्याय की यादें वोटर्स के रुख को प्रभावित करती हैं।
चन्नार विद्रोह और आज की राजनीति: स्टालिन बनाम विजयन

2023 में चन्नार विद्रोह के 200 साल पूरे होने पर केरल और तमिलनाडु की राजनीति गरमा गई थी। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन और केरल के सीएम पिनाराई विजयन ने इस मौके पर एक मंच साझा किया।
- विपक्षी नैरेटिव: वामपंथी दल इस इतिहास का उपयोग यह बताने के लिए करते हैं कि वे हमेशा से ‘सनातन धर्म’ के नाम पर होने वाले शोषण के खिलाफ रहे हैं।
- बीजेपी का पक्ष: बीजेपी और आरएसएस इसे एक ‘सिलेक्टिव नैरेटिव’ करार देते हैं। उनका तर्क है कि इतिहास की इन दुखद घटनाओं को आज के संदर्भ में जोड़कर केवल राजनीतिक लाभ के लिए लोगों को बांटा जा रहा है।
केरल का जातीय समीकरण और वोट बैंक
केरल की राजनीति मुख्य रूप से चार धड़ों— नायर, एझावा, मुस्लिम और ईसाई के इर्द-गिर्द घूमती है। नंगेली और मुलक्करम का मुद्दा विशेष रूप से एझावा और नादर समुदाय को प्रभावित करता है।
इतिहास बनाम राजनीति: NCERT विवाद
2019 में जब NCERT ने 9वीं कक्षा की पाठ्यपुस्तक से त्रावणकोर के संघर्ष से जुड़ा अध्याय हटाया, तो केरल में बड़ा विवाद खड़ा हो गया। सीएम विजयन ने इसे ‘इतिहास का भगवाकरण’ बताया। केरल सरकार ने कड़ा रुख अपनाते हुए हटाए गए चैप्टर्स को ‘सप्लीमेंट्री’ किताबों के माध्यम से पढ़ाना जारी रखा। यह स्पष्ट करता है कि मुलक्करम का मुद्दा आज भी कितना संवेदनशील और राजनीतिक रूप से सक्रिय है।
निष्कर्ष: क्या इतिहास अब भी वोट दिलाता है?
आज के दौर में भले ही केरल की युवा पीढ़ी के लिए मुलक्करम एक पुरानी कहानी मात्र हो, लेकिन राजनीतिक मंचों पर इसके घाव बार-बार हरे किए जाते हैं। जहाँ एक तरफ इसे सामाजिक न्याय की जीत के रूप में पेश किया जाता है, वहीं दूसरी ओर इसे धार्मिक ध्रुवीकरण का जरिया भी माना जाता है। नंगेली की कहानी आज भी उन 50+ सीटों पर एक अदृश्य चुनावी मुद्दा बनी हुई है जहाँ जातिगत पहचान जीत-हार का बड़ा अंतर पैदा करती है।

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