ईरान और अमेरिका-इजराइल के बीच बढ़ते तनाव में Internet Blackout और वैश्विक डिजिटल सुरक्षा को लेकर ईरान की तरफ से सीधी धमकियां चिंता का विषय बनी हुई हैं।
ईरान की ‘डिजिटल नाकेबंदी’ की धमकी: क्या समुद्र के नीचे बिछी केबल्स हैं निशाने पर?
ईरान ने रणनीतिक रूप से संकेत दिए हैं कि यदि उस पर हमला होता है या उसकी तेल सप्लाई रोकी जाती है, तो वह न केवल होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को बंद कर देगा, बल्कि इस क्षेत्र की ‘अदृश्य संपत्तियों’ को भी नुकसान पहुँचा सकता है। जानकारों का मानना है कि इन ‘अदृश्य संपत्तियों’ में समुद्र के नीचे बिछी फाइबर ऑप्टिक केबल्स सबसे ऊपर हैं।
ईरान की रणनीति के 3 बड़े बिंदु:
- होर्मुज को ‘डिजिटल डेड ज़ोन’ बनाने का इशारा: ईरान के शीर्ष सैन्य अधिकारियों ने पहले भी कहा है कि वे दुनिया की ‘रसद और संचार की रगों’ (Veins of Logistics and Communication) को काटने की क्षमता रखते हैं। चूंकि दुनिया का 97% डेटा इन्हीं केबल्स से गुजरता है, इसलिए Internet Blackout का खतरा अब केवल तकनीकी खराबी नहीं, बल्कि एक युद्ध रणनीति (War Strategy) बन चुका है।
- हुती विद्रोहियों का कनेक्शन: लाल सागर (Red Sea) में पहले भी केबल्स को नुकसान पहुँचाने की खबरें आई थीं, जिनके पीछे ईरान समर्थित हुती विद्रोहियों का हाथ होने का शक जताया गया था। अब विशेषज्ञ डरे हुए हैं कि ईरान सीधे तौर पर होर्मुज में मौजूद केबल्स को ‘हाइब्रिड वारफेयर’ के तहत निशाना बना सकता है।
- साइबर हमलों की चेतावनी: केबल्स को काटने के अलावा, ईरान ने अपनी साइबर सेना के जरिए वैश्विक इंटरनेट इंफ्रास्ट्रक्चर और सैटेलाइट्स को हैक करने की चेतावनी भी दी है। यह Internet Blackout की स्थिति को और भी बदतर बना सकता है क्योंकि इससे डेटा रूटिंग (Re-routing) की प्रक्रिया भी बाधित हो जाएगी।
सुरक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक, ईरान की पनडुब्बियां और डीप-सी डाइविंग यूनिट्स (Deep-sea diving units) होर्मुज के संकरे रास्ते में बिछी केबल्स की सटीक लोकेशन जानती हैं। यदि युद्ध भड़कता है, तो ईरान ‘डिजिटल ब्लॉकेड’ (Digital Blockade) कर सकता है, जिससे भारत और यूरोप के बीच का इंटरनेट संचार मिनटों में टूट सकता है।
Internet Blackout India: समुद्र के नीचे छिपा है इंटरनेट का जाल

अक्सर हमें लगता है कि इंटरनेट सैटेलाइट के माध्यम से चलता है, लेकिन असलियत यह है कि वैश्विक डेटा का 95 से 97 प्रतिशत हिस्सा समुद्र के तल में बिछी पतली फाइबर ऑप्टिक केबल्स के जरिए ट्रांसफर होता है। Internet Blackout का सबसे बड़ा कारण इन केबल्स का भौतिक रूप से कटना या युद्ध के दौरान उन्हें निशाना बनाना हो सकता है।
होर्मुज के रास्ते के नीचे से SEA-ME-WE, AAE-1 और EIG जैसे विशाल केबल सिस्टम गुजरते हैं, जो भारत को यूरोप, अफ्रीका और पश्चिम एशिया के डिजिटल नेटवर्क से जोड़ते हैं।
होर्मुज रूट क्यों है भारत के लिए जीवनरेखा?

भारत की अधिकांश अंतरराष्ट्रीय इंटरनेट बैंडविड्थ अरब सागर और खाड़ी क्षेत्र के इसी संकरे रास्ते से होकर आती है। यदि ईरान और अमेरिका के बीच युद्ध भड़कता है और इन केबल्स को क्षति पहुँचती है, तो भारत में इंटरनेट की ‘लेटेंसी’ (डेटा पहुँचने का समय) कई गुना बढ़ जाएगी।
- बफरिंग का संकट: यूट्यूब, इंस्टाग्राम और नेटफ्लिक्स जैसे मनोरंजन ऐप्स पर लोड बढ़ेगा और बफरिंग की समस्या आम हो जाएगी।
- वीडियो कॉलिंग: वर्क-फ्रॉम-होम और अंतरराष्ट्रीय वीडियो कॉल्स में भारी रुकावटें आएंगी।
भारतीय IT सेक्टर और इकोनॉमी पर पड़ने वाला असर

दुनिया का करीब 95 से 97% डेटा फाइबर ऑप्टिक केबल्स के जरिए ट्रांसफर होता है। फोटो सोर्स- https://www.submarinecablemap.com
Internet Blackout का सीधा असर भारत के ₹23.48 लाख करोड़ ($250 Billion) के विशाल IT और आउटसोर्सिंग उद्योग पर पड़ेगा।
- सर्विस एग्रीमेंट्स का टूटना: अमेरिकी और यूरोपीय ग्राहकों को दी जाने वाली ‘रियल-टाइम’ सर्विसेज ठप हो सकती हैं, जिससे भारतीय कंपनियों पर भारी जुर्माना लग सकता है।
- बैंकिंग और शेयर बाजार: बैंकिंग ट्रांजेक्शन (SWIFT) और शेयर मार्केट की हाई-फ्रीक्वेंसी ट्रेडिंग में मिलीसेकंड की देरी भी करोड़ों के नुकसान का सबब बन सकती है।
- रेमिटेंस: खाड़ी देशों से आने वाले धन (Remittance) के प्रवाह में भी तकनीकी बाधाएं आ सकती हैं।
क्या वाकई पूरी तरह बंद हो जाएगा इंटरनेट?
इंटरनेट का आर्किटेक्चर इस तरह बनाया गया है कि यदि एक रास्ता बंद होता है, तो डेटा ‘री-रूट’ होकर दूसरे रास्ते (जैसे पैसिफिक रूट) से जाने लगता है। इसलिए Internet Blackout का मतलब ‘टोटल ब्लैकआउट’ नहीं, बल्कि ‘एक्सट्रीम स्लो इंटरनेट’ (Extreme Slow Internet) होगा। वैकल्पिक रास्तों पर अचानक लोड बढ़ने से इंटरनेट की गति 90 के दशक जैसी हो सकती है।
वैकल्पिक समाधान और भारत की तैयारी
इस डिजिटल चोकपॉइंट के खतरे को देखते हुए भारत सरकार अब वैकल्पिक मार्गों पर निवेश कर रही है।
- सैटेलाइट इंटरनेट: इलॉन मस्क की ‘स्टारलिंक’ और रिलायंस की ‘जियो स्पेस’ जैसी सेवाओं को एक मज़बूत बैकअप के तौर पर देखा जा रहा है।
- न्यू केबल रूट्स: भारत अब ऐसी केबल्स बिछाने की योजना बना रहा है जो युद्धग्रस्त या संवेदनशील क्षेत्रों को बायपास कर सकें।
- घरेलू डेटा सेंटर: भारत में डेटा लोकलाइजेशन को बढ़ावा दिया जा रहा है ताकि घरेलू डेटा को अंतरराष्ट्रीय केबल्स पर कम निर्भर रहना पड़े।
डिजिटल सुरक्षा ही असली सुरक्षा
होर्मुज में बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव केवल तेल की कीमतों को नहीं, बल्कि हमारे स्मार्टफोन की स्क्रीन को भी प्रभावित करने वाला है। Internet Blackout जैसी स्थिति से बचने के लिए भारत को अपनी डिजिटल संप्रभुता और कनेक्टिविटी के अन्य रास्तों को युद्धस्तर पर मज़बूत करना होगा।

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