ओमान की खाड़ी और होर्मुज जलडमरूमध्य के रणनीतिक समुद्री रास्तों पर अचानक बढ़ा तनाव अब एक भीषण अंतरराष्ट्रीय संकट में बदल चुका है। इस पूरे विवाद के बीच हाल ही में हुआ एक भयानक अमेरिकी नौसेना हमला वैश्विक मीडिया की सुर्खियों में बना हुआ है। इस सैन्य कार्रवाई ने भारत सरकार सहित दुनिया भर के व्यापारिक नीति-निर्माताओं को गहरी चिंता और हैरत में डाल दिया है।

इस पूरे घटनाक्रम का सबसे दुखद और संवेदनशील पहलू यह है कि जिन कमर्शियल जहाजों पर मिसाइलें दागी गईं, उन पर भारी संख्या में भारतीय नागरिक और समुद्री चालक दल (क्रू मेंबर्स) सवार थे। अमेरिकी लड़ाकू विमानों की इस अंधाधुंध गोलाबारी की वजह से तीन निर्दोष भारतीय नाविकों को अपनी जान गंवानी पड़ी है। इस कूटनीतिक तनाव ने वैश्विक समुद्री व्यापार की सुरक्षा पर एक बहुत बड़ा सवालिया निशान खड़ा कर दिया है।
अरब सागर और ओमान के तटवर्ती इलाकों से गुजरने वाले अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक जहाजों पर लगातार तीन दिनों तक आसमान से मिसाइलें बरसाई गईं। अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) की तरफ से जारी की गई रिपोर्ट्स के अनुसार, इस आक्रामक सैन्य अभियान के दौरान फाइटर जेट्स का सीधा इस्तेमाल देखने को मिला है।
सबसे पहला हमला 8 जून को दोपहर के वक्त हुआ, जब पलाऊ देश का झंडा लगाकर आगे बढ़ रहे ‘M/T मैरिवेक्स’ नाम के एक बड़े तेल टैंकर पर अमेरिकी एयरक्राफ्ट कैरियर से उड़े F/A-18 सुपर हॉर्नेट विमानों ने सटीक गोलाबारी शुरू कर दी।
यह घटना मुंबई के समुद्री तट से करीब 1350 किलोमीटर की दूरी पर अंजाम दी गई। राहत की बात यह रही कि इस प्रभावित जहाज पर मौजूद सभी 24 भारतीय कर्मचारियों को ओमान के सैन्य हेलीकॉप्टरों और इंडियन कोस्ट गार्ड्स की मदद से समय रहते सुरक्षित रेस्क्यू कर लिया गया।

इसके ठीक दो दिन बाद, यानी 10 जून की सुबह एक बेहद दर्दनाक और बड़ी अनहोनी सामने आई। ओमान के तट के करीब यात्रा कर रहे ‘MT सेटेबेलो’ नाम के एक अन्य कार्गो शिप के इंजन कंपार्टमेंट को अमेरिकी मिसाइल हमलों से पूरी तरह ध्वस्त कर दिया गया।
इस टैंकर पर सवार कुल 28 कर्मियों में से 24 नाविक भारतीय नागरिक थे। केंद्रीय शिपिंग मंत्रालय के आधिकारिक बयानों के मुताबिक, इस भीषण गोलाबारी में तीन भारतीय नौसैनिकों की मौके पर ही मौत हो गई।
मरने वाले जांबाज नागरिकों की पहचान डेक कैडेट आदित्य शर्मा, इंजन फिटर शिवानंद चौरसिया और चीफ इंजीनियर पटनाला सुरेश के तौर पर की गई है। इस घटना के तुरंत बाद, यानी 11 जून को ‘MT जलवीर’ नाम के एक तीसरे जहाज पर भी अमेरिकी विमानों द्वारा दो खतरनाक हेलफायर मिसाइलें दागी गईं।
इस गंभीर विवाद की असल पटकथा इस साल 28 फरवरी को ही लिख दी गई थी, जब मिडल-ईस्ट में फैली भीषण जंग के बाद ईरान ने दुनिया की लाइफलाइन कहे जाने वाले होर्मुज जलडमरूमध्य को पूरी तरह ब्लॉक करने का प्रयास किया था। ईरान की इस कार्रवाई और समुद्र में माइन्स बिछाने की घटनाओं के चलते दुनिया भर में होने वाली कुल तेल सप्लाई का करीब 20 प्रतिशत हिस्सा पूरी तरह ठप हो गया था।
वैश्विक बाजार को मंदी से बचाने और इस समुद्री रास्ते को बलपूर्वक खुलवाने के लिए अमेरिका ने 13 अप्रैल को ओमान की खाड़ी के पास अपनी सख्त सैन्य नाकेबंदी लागू कर दी।
यूएस मिलिट्री का यह सीधा दावा है कि ओमान की खाड़ी में हुआ यह अमेरिकी नौसेना हमला किसी देश के खिलाफ नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय नियमों और प्रतिबंधों को ताक पर रखने वाले जहाजों के खिलाफ है। अमेरिका का आरोप है कि ये सभी पोत ‘शैडो फ्लीट’ (Shadow Fleet) का एक सक्रिय हिस्सा थे।
शैडो फ्लीट का आसान शब्दों में मतलब उन संदिग्ध और बेनामी जहाजों से होता है, जिनका मालिकाना हक और कंट्रोल किसी प्रतिबंधित देश या गुप्त शेल कंपनियों के पास होता है, लेकिन वे पकड़े जाने से बचने के लिए पलाऊ या गिनी-बिसाऊ जैसे बेहद छोटे देशों के झंडों और फर्जी डाक्यूमेंट्स का इस्तेमाल करते हैं।
इन हमलों के बाद अंतरराष्ट्रीय मीडिया में तेजी से यह कयास लगाए जाने लगे कि क्या भारत अमेरिकी आर्थिक पाबंदियों की नजरों से बचकर ईरान से गुपचुप तरीके से कच्चा तेल खरीद रहा है? मरीन ट्रैफिक डेटा और स्वतंत्र थिंक टैंक की रिपोर्टों की मानें, तो इस बात का कोई भी सबूत नहीं मिला है कि भारत इस तरह की किसी भी अवैध या गुप्त व्यापारिक गतिविधि में संलिप्त है।
आमतौर पर प्रतिबंधित तेल का परिवहन करने वाले ये जहाज अपनी पहचान छिपाने के लिए समुद्र के बीचों-बीच एक टैंकर से दूसरे टैंकर में माल ट्रांसफर करते हैं और अपना ट्रैकिंग सिग्नल (GPS) पूरी तरह बंद कर देते हैं।
यहाँ सबसे महत्वपूर्ण बात यह समझने वाली है कि किसी भी अंतरराष्ट्रीय जहाज पर भारतीय क्रू या चालक दल के तैनात होने का यह कतई अर्थ नहीं होता कि वह जहाज भारत की किसी कंपनी का है। भारत के नाविक अपनी बेहतरीन कार्यकुशलता के कारण पूरी दुनिया की मर्चेंट नेवी का मुख्य आधार स्तंभ माने जाते हैं।
वे अपनी पेशेवर नौकरियों के लिए वैश्विक स्तर पर पंजीकृत किसी भी विदेशी कंपनी के जहाजों पर सेवाएं देते हैं। जहाजों के भीतर कौन सा सामान लोड किया गया है और उसे दुनिया के किस बंदरगाह पर डिलीवर किया जाना है, इस पूरी व्यावसायिक प्रक्रिया से आम नाविकों का कोई सीधा सरोकार या नियंत्रण नहीं होता है।
अगर हम कूटनीतिक और आर्थिक इतिहास के पन्नों को पलटें, तो भारत ने पिछले लगभग सात सालों से ईरान के साथ अपने सभी आधिकारिक तेल सौदों को पूरी तरह बंद कर रखा है। साल 2018 के दौर में भारत अपनी कुल ऊर्जा आवश्यकताओं का तकरीबन 9 प्रतिशत तेल ईरान से ही खरीदता था, लेकिन तत्कालीन अमेरिकी प्रशासन द्वारा लगाए गए सख्त प्रतिबंधों के बाद भारत ने देश के रणनीतिक हितों को देखते हुए ईरान से तेल लेना बंद कर दिया और उसकी जगह सऊदी अरब, रूस और अमेरिका से अपना आयात बढ़ा दिया।
हालांकि, हाल ही में 20 मार्च 2026 को अमेरिकी ट्रेजरी डिपार्टमेंट ने भारतीय रिफाइनरियों को केवल एक महीने (19 अप्रैल 2026 तक) के लिए ईरान से तेल आयात करने की एक विशेष और अस्थायी राहत प्रदान की थी।
शिप ट्रैकिंग डेटा के अनुसार, इस एक महीने की छूट अवधि के दौरान इंडियन ऑयल और रिलायंस एनर्जी जैसी भारत की दिग्गज कंपनियों ने लगभग 40 लाख बैरल कच्चे तेल का पूरी तरह से वैध आयात किया था। यह तेल ‘जया’ और ‘फेलिसिटी’ जैसे अधिकृत जहाजों से ओडिशा के पारादीप पोर्ट पर उतारा गया था। 19 अप्रैल को यह समय-सीमा समाप्त होने के बाद से भारत द्वारा ईरान से किसी भी प्रकार का तेल खरीदने का कोई आधिकारिक डेटा मौजूद नहीं है।
निर्दोष वाणिज्यिक जहाजों पर अमेरिकी सेना के इस हिंसक कदम और उसमें तीन बेकसूर भारतीय नागरिकों की असमय मौत ने नई दिल्ली के गलियारों में भारी आक्रोश पैदा कर दिया है। भारत सरकार ने इस पूरे मुद्दे को बेहद संवेदनशील और कूटनीतिक रूप से गंभीर माना है।
विदेश मंत्रालय ने तुरंत कड़ा रुख अपनाते हुए नई दिल्ली में नियुक्त अमेरिकी कार्यवाहक राजदूत (Charge d’Affaires) जेसन मीक्स को समन जारी कर तलब किया। विदेश मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव नागराज नायडू ने अमेरिकी दूत के सामने इस हमले को लेकर भारत की कड़ी आपत्तियों और सुरक्षा संबंधी चिंताओं को दर्ज कराया।
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान बिना किसी लाग-लपेट के साफ शब्दों में कहा कि अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक मार्गों पर सिविलियन इन्फ्रास्ट्रक्चर और कमर्शियल जहाजों को इस प्रकार निशाना बनाना पूरी तरह से गलत है। भारत ने अमेरिकी प्रशासन को बहुत स्पष्ट शब्दों में यह कड़ा संदेश भेजा है कि समुद्र में काम करने वाले नाविकों की सुरक्षा को हर हाल में प्राथमिकता दी जानी चाहिए और इस तरह के एकतरफा सैन्य हमलों पर तत्काल प्रभाव से रोक लगनी चाहिए।
वैश्विक मामलों के जानकारों का भी कहना है कि इस प्रकार के हमलों से पैदा हुआ असुरक्षा का माहौल आने वाले दिनों में वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए और अधिक विनाशकारी साबित हो सकता है।
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