यह केवल ‘हैप्पी विमेंस डे’ कहने का दिन नहीं, बल्कि महिलाओं के खून-पसीने और उनके अधिकारों की लड़ाई का इतिहास है। आइए जानते हैं महिला दिवस का असली इतिहास:
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस का असली इतिहास: एक संघर्ष की दास्तां
असल में इस दिन का शुरुआती और आधिकारिक नाम ‘अंतरराष्ट्रीय कामकाजी महिला दिवस’ (International Working Women’s Day) ही था। इसे समाजवाद और श्रमिक आंदोलनों से अलग करके नहीं देखा जा सकता।
आज हम जिस अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस को मनाते हैं, उसका जन्म किसी कॉर्पोरेट ऑफिस या गिफ्ट शॉप में नहीं, बल्कि मजदूर आंदोलनों की कोख से हुआ था। इसका असली नाम ‘अंतरराष्ट्रीय कामकाजी महिला दिवस’ (International Working Women’s Day) था।
आज हम जिस दिन को सम्मान और प्रेम के रूप में मनाते हैं, उसका बीज 20वीं सदी की शुरुआत में अमेरिका और रूस की फैक्ट्रियों में पड़ा था।

1. 1908: न्यूयॉर्क की सड़कों पर उठी आवाज़
महिला दिवस की नींव 1908 में तब पड़ी, जब न्यूयॉर्क शहर में लगभग 15,000 कामकाजी महिलाओं ने एक विशाल मार्च निकाला।
- मांग: उनकी मांगें बहुत बुनियादी थीं— काम के घंटों में कमी, बेहतर वेतन और वोट देने का अधिकार (Right to Vote)।
2. 1910: एक अंतरराष्ट्रीय विचार (क्लारा ज़ेटकिन)
जर्मनी की प्रसिद्ध एक्टिविस्ट क्लारा ज़ेटकिन ने 1910 में कोपेनहेगन में एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान यह प्रस्ताव रखा कि हर देश में महिलाओं के अधिकारों के लिए साल में एक विशेष दिन होना चाहिए। वहां मौजूद 17 देशों की 100 महिलाओं ने इसे सर्वसम्मति से स्वीकार किया।
3. 8 मार्च की तारीख कैसे तय हुई? (रूसी क्रांति का संबंध)
महिला दिवस 8 मार्च को मनाए जाने के पीछे रूस की महिलाओं का सबसे बड़ा योगदान है:
- 1917 का आंदोलन: प्रथम विश्व युद्ध के दौरान रूसी महिलाओं ने ‘ब्रेड और पीस’ (रोटी और शांति) की मांग को लेकर ऐतिहासिक हड़ताल की थी।
- तारीख का गणित: रूसी कैलेंडर के अनुसार वह दिन 23 फरवरी था, लेकिन अंतरराष्ट्रीय (ग्रेगोरियन) कैलेंडर में वह तारीख 8 मार्च थी। इस हड़ताल के दबाव में वहां के राजा (ज़ार) को सत्ता छोड़नी पड़ी और महिलाओं को वोट देने का अधिकार मिला। इसी ऐतिहासिक दिन की याद में 8 मार्च को पक्का किया गया।
4. 1975: संयुक्त राष्ट्र (UN) की मान्यता
साल 1975 में संयुक्त राष्ट्र ने पहली बार आधिकारिक रूप से अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाना शुरू किया। इसके बाद 1977 में सदस्य देशों से इसे प्रतिवर्ष मनाने का आह्वान किया गया।
भारत में इस दिन का महत्व
भारत में कामकाजी महिला दिवस का अर्थ केवल नौकरी करने वाली महिलाओं तक सीमित नहीं है। यह उन ग्रामीण महिलाओं का भी दिन है जो खेतों में पसीना बहाती हैं, उन ‘आशा’ वर्कर्स और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं का है जो स्वास्थ्य सेवाओं की रीढ़ हैं, और उन लाखों महिलाओं का है जो असंगठित क्षेत्रों में अपनी पहचान के लिए लड़ रही हैं।
चुनौतियां जो आज भी खड़ी हैं
प्रगति के बावजूद, कुछ मोर्चों पर संघर्ष जारी है:
- वेतन अंतर (Pay Gap): आज भी समान पद पर काम करने वाली महिलाओं को पुरुषों की तुलना में औसतन 15-20% कम वेतन मिलता है।
- बिना वेतन का काम (Unpaid Care Work): भारतीय महिलाएं आज भी घर के कामों और देखभाल में पुरुषों की तुलना में 6 गुना ज्यादा समय बिताती हैं, जिसे अर्थव्यवस्था में गिना नहीं जाता।
- लीडरशिप रोल: मिडिल मैनेजमेंट में महिलाएं बहुत हैं, लेकिन बोर्डरूम (CEOs) में उनकी संख्या अभी भी 10% के आसपास संघर्ष कर रही है।
विष्य का ग्राफ: क्या कहती है रिपोर्ट?
विश्व बैंक और अन्य संस्थाओं का मानना है कि यदि भारत अपनी महिला कार्यबल भागीदारी को पुरुषों के बराबर (लगभग 70-75%) ले आता है, तो भारत की अर्थव्यवस्था में 27% की अतिरिक्त वृद्धि हो सकती है।
लेकिन सब कुछ पूरी तरह गुलाबी नहीं है। भारत में अभी भी दो बड़ी चुनौतियां हैं:
- Double Burden: कामकाजी महिला को ऑफिस के साथ-साथ घर की पूरी जिम्मेदारी भी संभालनी पड़ती है।
- Safety: कार्यस्थल पर सुरक्षा और आने-जाने की सुविधा अभी भी एक बड़ा मुद्दा है जिसके कारण कई महिलाएं काम छोड़ देती हैं।

