Harish Rana Passive Euthanasia Case: 13 साल का दर्द थमा; हरीश राणा का अंतिम संस्कार, अंगदान से 6 लोगों को मिला नया जीवन

Harish Rana Euthanasia Death Funeral

नई दिल्ली/गाजियाबाद: बुधवार की सुबह दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट में एक अत्यंत भावुक दृश्य देखने को मिला। 13 साल तक कोमा और लाइलाज बीमारी (क्वाड्रिप्लेजिया) से जूझने वाले 31 वर्षीय हरीश राणा का अंतिम संस्कार संपन्न हुआ। Harish Rana Passive Euthanasia Case के तहत सुप्रीम कोर्ट की अनुमति के बाद 24 मार्च को उन्होंने एम्स में अंतिम सांस ली थी। उनके छोटे भाई आशीष ने उन्हें मुखाग्नि दी, जबकि पिता अशोक राणा ने रूंधे गले से लोगों से अपील की, “कोई रोना मत, बेटा शांति से जाए, बस यही प्रार्थना है।”

अंगदान: जाते-जाते 6 लोगों को दे गए नई जिंदगी

हरीश भले ही दुनिया छोड़ गए, लेकिन उनके अंगों ने छह अन्य परिवारों में खुशियां लौटा दी हैं। Harish Rana Passive Euthanasia Case में एम्स के डॉक्टरों ने जानकारी दी कि हरीश के फेफड़े, दोनों किडनी और कॉर्निया का दान किया गया है। यह अंगदान उन मरीजों के लिए एक वरदान साबित होगा जो जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे।


⚖️ क्या है ‘पैसिव यूथेनेशिया’ और सुप्रीम कोर्ट का फैसला?

सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च 2026 को हरीश राणा को इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की इजाजत दी थी। भारत में Harish Rana Passive Euthanasia Case पहला ऐसा मामला है जहाँ किसी जीवित व्यक्ति के लिए कोर्ट ने यह आदेश दिया।

इच्छामृत्यु के दो प्रकार होते हैं:

  1. पैसिव यूथेनेशिया (Passive Euthanasia): इसमें मरीज को जीवित रखने वाले बाहरी सपोर्ट (जैसे वेंटिलेटर, फीडिंग ट्यूब या दवाइयां) को हटा लिया जाता है ताकि मृत्यु प्राकृतिक रूप से हो सके। भारत में केवल यही कानूनी है।
  2. एक्टिव यूथेनेशिया (Active Euthanasia): इसमें डॉक्टर जानलेवा इंजेक्शन या दवा देकर मरीज की जान लेते हैं। भारत में यह गैर-कानूनी है।

⏳ 2013 से 2026: एक मेधावी छात्र का दर्दनाक सफर

हरीश राणा की कहानी किसी का भी दिल दहला सकती है:

  • हादसा: 2013 में चंडीगढ़ की पंजाब यूनिवर्सिटी से बीटेक करते समय हरीश हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिर गए थे।
  • बीमारी: इस गिरने से उन्हें क्वाड्रिप्लेजिया (Quadriplegia) हो गया, जिसमें गर्दन के नीचे का पूरा शरीर लकवाग्रस्त हो जाता है। वे न बोल सकते थे, न कुछ महसूस कर सकते थे।
  • आर्थिक तंगी: 13 साल तक बिस्तर पर पड़े रहने से शरीर में गहरे घाव (बेडसोर्स) हो गए थे। परिवार इलाज और देखभाल में आर्थिक और मानसिक रूप से पूरी तरह टूट चुका था।

📜 इच्छामृत्यु का कानूनी इतिहास (2018 का फैसला)

भारत में इच्छामृत्यु की नींव 2011 के अरुणा शानबाग केस से पड़ी थी, लेकिन 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने इसे ‘सम्मान के साथ मरने का अधिकार’ (Article 21) मानते हुए कानूनी मान्यता दी। Harish Rana Passive Euthanasia Case इसी कानून के क्रियान्वयन का सबसे बड़ा उदाहरण बना है।

इच्छामृत्यु के नियम:

  • यदि मरीज ने पहले ही ‘लिविंग विल’ (Living Will) लिखी हो, तो प्रक्रिया आसान होती है।
  • यदि ‘लिविंग विल’ न हो, तो परिवार की सहमति के बाद मेडिकल बोर्ड और न्यायिक मजिस्ट्रेट की मंजूरी अनिवार्य होती है।

💡 ‘सच्च का समय’ का विशेष विश्लेषण:

“हरीश राणा का जाना समाज के लिए एक गहरा सबक है। एक तरफ यह आधुनिक चिकित्सा की सीमाओं को दर्शाता है, तो दूसरी तरफ हमारे देश की न्याय प्रणाली की संवेदनशीलता को। Harish Rana Passive Euthanasia Case ने न केवल एक पीड़ित को दर्द से मुक्ति दी, बल्कि ‘Right to Die with Dignity’ (सम्मान से मरने का अधिकार) की परिभाषा को जमीन पर उतारा है।”

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