भारत का रुपया क्यों गिर रहा है: एशिया में सबसे खराब प्रदर्शन का पूरा सच

डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया एशिया में सबसे तेजी से टूटकर ₹95 के पार पहुंच गया है। जानिए आखिर पाकिस्तानी रुपया और चीनी युआन क्यों मजबूत हो रहे हैं और आरबीआई गिरते रुपए को बचाने के लिए क्या कदम उठा रहा है।

वैश्विक मंदी और भू-राजनीतिक तनाव के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था के मोर्चे से एक बेहद चिंताजनक खबर सामने आ रही है। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय करेंसी यानी रुपया एशिया महाद्वीप में सबसे तेजी से गोता लगा रहा है। आंकड़ों के मुताबिक, पिछले महज 5 महीनों के भीतर भारतीय रुपए की कीमत में 6% से अधिक की भारी गिरावट दर्ज की गई है। इस वक्त रोकड़ मंडी (फॉरेक्स मार्केट) में 1 डॉलर की कीमत ₹95 के आस-पास ट्रेड कर रही है।

हैरान करने वाली बात यह है कि जहां एक तरफ भारत की करेंसी लगातार कमजोर हो रही है, वहीं दूसरी तरफ हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान का रुपया 0.5% और चीन की करेंसी युआन 3% तक मजबूत हुई है। ऐसे में देश के आम नागरिकों से लेकर बड़े निवेशकों के मन में यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर भारत का रुपया क्यों गिर रहा है और दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था का दम भरने वाले भारत से कहाँ चूक हो रही है। आइए देश के टॉप अर्थशास्त्रियों के विश्लेषण से इस पूरे आर्थिक संकट का कच्चा-चिट्ठा समझते हैं।

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1. रोकड़ मंडी का गणित: आखिर डॉलर के सामने क्यों बेबस हुआ रुपया?

किसी भी देश की करेंसी की कीमत अंतरराष्ट्रीय डिजिटल बाजार यानी फॉरेक्स मार्केट (विदेशी मुद्रा बाजार) में उसकी मांग और आपूर्ति (Demand and Supply) के आधार पर तय होती है। अर्थशास्त्र का सीधा नियम है- जिसकी मांग ज्यादा होगी, उसकी कीमत बढ़ेगी।

चूंकि दुनिया का लगभग 88% अंतरराष्ट्रीय व्यापार डॉलर में ही सेटल होता है, इसलिए वैश्विक केंद्रीय बैंकों के पास मौजूद कुल विदेशी मुद्रा भंडार का करीब 57% हिस्सा सिर्फ अमेरिकी डॉलर का है। जब भारत में डॉलर की आमद (FDI या एक्सपोर्ट के जरिए) कम हो जाती है और यहाँ से डॉलर बाहर ज्यादा जाने लगता है, तो बाजार में डॉलर की किल्लत हो जाती है। इसी असंतुलन के कारण डॉलर मजबूत होता है और भारतीय रुपया ताश के पत्तों की तरह ढहने लगता है।

2. रुपए की ऐतिहासिक गिरावट के 4 सबसे बड़े और खतरनाक फैक्टर्स

देश के दिग्गज अर्थशास्त्रियों के मुताबिक, मौजूदा समय में रुपए के रिकॉर्ड स्तर तक टूटने के पीछे मुख्य रूप से चार बड़े कारण जिम्मेदार हैं:

  • कच्चे तेल (Crude Oil) की आसमान छूती कीमतें: भारत अपनी कुल जरूरत का 85% से ज्यादा कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है, जिसकी पेमेंट केवल डॉलर में होती है। ईरान जंग के चलते कच्चे तेल का भाव 72 डॉलर से बढ़कर 126 डॉलर प्रति बैरल तक जा चुका था और वर्तमान में भी यह 88.7 डॉलर के आस-पास बना हुआ है। रेटिंग एजेंसी ICRA के मुताबिक, तेल की कीमत में हर 10 डॉलर की बढ़ोतरी भारत के इम्पोर्ट बिल पर 14 से 16 बिलियन डॉलर का अतिरिक्त बोझ डालती है, जिससे डॉलर की मांग अप्रत्याशित रूप से बढ़ जाती है।
  • विदेशी निवेशकों (FII) की अंधाधुंध बिकवाली: साल 2025 में विदेशी संस्थागत निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से 1.66 लाख करोड़ रुपए निकाले थे, जबकि साल 2026 के शुरुआती 5 महीनों में ही वे 2.26 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा लेकर देश से बाहर जा चुके हैं। भारतीय बाजार का पीई रेशियो (PE Ratio) ज्यादा होने के कारण निवेशक मुनाफावसूली कर रहे हैं, जिससे भारत की ग्लोबल रैंकिंग चौथे स्थान से गिरकर सीधे सातवें नंबर पर आ गई है।
  • घरेलू बाजार में भारी अटकलबाजी (Speculation): अर्थशास्त्री डॉ. जयति घोष और प्रो. अरुण कुमार के अनुसार, घरेलू ट्रेडर्स और सट्टेबाज लगातार कयास लगा रहे हैं कि रुपया और गिरेगा। इस डर से भारतीय इम्पोर्टर्स भविष्य के नुकसान से बचने के लिए एडवांस में ज्यादा डॉलर खरीद रहे हैं, जबकि एक्सपोर्टर्स ज्यादा मुनाफे के लालच में अपनी डॉलर की कमाई को विदेशों में ही रोक रहे हैं।
  • डोनाल्ड ट्रम्प और वैश्विक कूटनीति का असर: अमेरिका में डोनाल्ड ट्रम्प के सत्ता संभालने के बाद भारत पर 50% तक टैरिफ लगाने की घोषणा और आईएमएफ (IMF) द्वारा भारत के जीडीपी कैलकुलेशन पर उठाए गए सवालों ने वैश्विक निवेशकों के भरोसे को डिगाया है। इसके साथ ही 6 बड़ी वैश्विक करेंसी को मापने वाला ‘डॉलर इंडेक्स’ भी 97.6 से बढ़कर 100 के पार चला गया है, जो डॉलर की वैश्विक मजबूती को दर्शाता है।

3. चीन और पाकिस्तान मजबूत, तो भारत सरकार से कहाँ हो रही है 3 बड़ी चूक?

जब हम पड़ोसी देशों की तुलना करते हैं, तो यह साफ हो जाता है कि यह केवल एक वैश्विक संकट नहीं है, बल्कि घरेलू पॉलिसियों में भी कुछ कमियां हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, सरकार से मुख्य रूप से ये तीन चूक हो रही हैं:

1. रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) और नई तकनीक में कम निवेश

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आज पूरी दुनिया में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और सेमीकंडक्टर की क्रांति चल रही है। जहां अमेरिका इस पर 500 अरब डॉलर और चीन 80 अरब डॉलर खर्च कर रहा है, वहीं भारत का बजट सिर्फ 2 अरब डॉलर का है। भारत रिसर्च (R&D) पर अपनी जीडीपी का महज 0.65% खर्च करता है, जबकि चीन और अमेरिका 3% के आस-पास खर्च करते हैं। प्रो. अरुण कुमार कहते हैं कि जब देश में नई तकनीक बनेगी ही नहीं, तो हम दुनिया को क्या बेचेंगे? और जब एक्सपोर्ट नहीं होगा, तो डॉलर देश में कैसे आएगा?

2. सर्विस-बेस्ड स्टार्टअप्स पर निर्भरता, मैन्युफैक्चरिंग में ढिलाई

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‘मेक इन इंडिया’ जैसी योजनाओं के बावजूद देश में वास्तविक मैन्युफैक्चरिंग की रफ्तार काफी धीमी है। भारत में खुलने वाले ज्यादातर नए स्टार्टअप केवल ऐप-बेस्ड या सर्विस ओरिएंटेड हैं (जैसे डिलीवरी या ई-कॉमर्स ऐप्स)। ये घरेलू तौर पर अच्छे हैं, लेकिन इनसे विदेशी मुद्रा या डॉलर की कमाई नहीं की जा सकती। जब तक भारत फाइटर जेट इंजन या भारी इलेक्ट्रॉनिक्स का निर्माण बड़े स्तर पर नहीं करेगा, तब तक स्थिति नहीं सुधरेगी।

3. बढ़ता हुआ व्यापार घाटा (Trade Deficit)

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साल 2025-26 के व्यापारिक आंकड़ों को देखें तो भारत ने 860 अरब डॉलर का सामान विदेशों में बेचा, लेकिन उसके मुकाबले 979 अरब डॉलर का सामान खरीदा। यानी देश को 119 अरब डॉलर का शुद्ध व्यापार घाटा हुआ है। भारत जिन चीजों को ज्यादा एक्सपोर्ट करता है (जैसे दवाइयां या रिफाइंड पेट्रोलियम), उनमें मार्जिन कम है, जबकि हाई-प्रॉफिट वाली मशीनरी और ऑटो पार्ट्स के लिए हम आज भी चीन, ताइवान और वियतनाम पर निर्भर हैं।

4. आर्थिक हाहाकार रोकने के लिए क्या कर रहा है रिजर्व बैंक (RBI)?

जब भी रोकड़ मंडी में रुपया तेजी से डूबने लगता है, तो भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) दखल देता है। आरबीआई अपने ‘विदेशी मुद्रा भंडार’ (Foreign Exchange Reserve) से डॉलर निकालकर खुले बाजार में बेचता है ताकि बाजार में डॉलर की कमी को पूरा किया जा सके और रुपए की मांग को सपोर्ट मिल सके। इसे वित्तीय भाषा में ‘रूपी-डॉलर स्वैप’ कहा जाता है।

मुद्रा भंडार में आई गिरावट: साल 2025-26 में आरबीआई ने रुपए को सहारा देने के लिए रिकॉर्ड 53.1 अरब डॉलर बेचे हैं। मई 2026 के आखिरी हफ्तों में भी बैंक ने करीब 7 अरब डॉलर बाजार में झोंके। लगातार डॉलर बेचने के कारण भारत का विदेशी मुद्रा भंडार पिछले एक साल के सबसे निचले स्तर यानी 681.4 अरब डॉलर पर आ गया है। हालांकि, राहत की बात यह है कि यह भंडार अभी भी देश के 10 महीने के इम्पोर्ट बिल को चुकाने के लिए पर्याप्त है।

5. बड़ा सवाल: क्या जल्द ही ₹100 का आंकड़ा पार कर जाएगा 1 डॉलर?

करेंसी के भविष्य को लेकर देश के अर्थशास्त्री दो धड़ों में बंटे नजर आ रहे हैं:

  1. गिरावट को सही मानने वाला धड़ा: 16वें वित्त आयोग के अध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया का मानना है कि रुपए को ₹100 के स्तर तक गिरने देना ही सबसे व्यावहारिक उपाय है। उनका तर्क है कि इससे भारत का एक्सपोर्ट सस्ता होगा और वैश्विक बाजार में हमारे सामान की प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी। उनके मुताबिक 100 सिर्फ एक मनोवैज्ञानिक नंबर है।
  2. गिरावट का विरोध करने वाला धड़ा: इसके विपरीत डॉ. जयति घोष जैसी अर्थशास्त्रियों का कहना है कि रुपए को ₹100 तक जाने देना भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बेहद आत्मघाती होगा। चूंकि भारत एक ‘इम्पोर्ट ड्रिवन इकोनॉमी’ (आयात पर निर्भर देश) है, इसलिए रुपया टूटने से देश में पेट्रोल, डीजल, खाद्य तेल, सोना और इलेक्ट्रॉनिक सामान बेतहाशा महंगे हो जाएंगे, जिससे घरेलू बाजार में महंगाई का भयंकर विस्फोट हो सकता है।

तात्कालिक राहत नहीं, लॉन्ग-टर्म कड़े फैसलों की है जरूरत

इस पूरे कूटनीतिक और आर्थिक संकट का सार यही है कि भारत का रुपया क्यों गिर रहा है का समाधान केवल रिजर्व बैंक द्वारा डॉलर बेचने से नहीं होगा। सरकार को अपनी एक्सपोर्ट पॉलिसी को मजबूत करना होगा और वर्ल्ड बैंक के लॉजिस्टिक्स परफॉर्मेंस इंडेक्स में भारत की 38वीं रैंकिंग को सुधारने के लिए टियर-2 शहरों की कनेक्टिविटी और कस्टम्स क्लियरेंस की डिजिटल रफ्तार को तेज करना होगा। जब तक देश रिसर्च और मैन्युफैक्चरिंग के हब के रूप में पूरी दुनिया के सामने खड़ा नहीं होता, तब तक डॉलर के मुकाबले रुपए की सेहत को पूरी तरह दुरुस्त करना नामुमकिन है।

Abhishek Ranga is the founder and editor-in-chief of Sach Ka Samay News. With a commitment to journalistic integrity, he focuses on delivering accurate, unbiased, and real-time news to the public. He oversees the digital strategy and content management for the portal, ensuring that every story meets the highest standards of reporting