देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन पटरियों पर दौड़ी: हरियाणा के जींद से शुरू हुआ शून्य-प्रदूषण का नया युग; पेट्रोल-बिजली छोड़ क्यों खास है यह ईंधन?

भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन

जींद (हरियाणा): भारतीय रेलवे के इतिहास में आज, 17 जुलाई 2026 का दिन एक बड़े और क्रांतिकारी बदलाव के गवाह के रूप में दर्ज हो गया है। हरियाणा के जींद रेलवे स्टेशन से आज देश की भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन ने अपनी पहली ऐतिहासिक यात्रा की शुरुआत की। इस ट्रेन की सबसे अनोखी बात यह है कि इसे चलाने के लिए न तो महंगे डीजल की जरूरत है और न ही सिर के ऊपर दौड़ने वाले बिजली के तारों (ओवरहेड वायर्स) की। यह ट्रेन जब पटरियों पर दौड़ती है, तो पीछे कोई धुआं या जहरीली राख नहीं छोड़ती; इसके साइलेंसर से केवल शुद्ध पानी की भाप (Water Vapor) बाहर निकलती है।

जींद से सोनीपत के बीच 89 किलोमीटर के रूट पर शुरू हुई 2,600 यात्रियों की क्षमता वाली यह ट्रेन दुनिया की सबसे ताकतवर हाइड्रोजन ट्रेनों में शुमार की जा रही है। आइए इस विशेष रिपोर्ट में समझते हैं हाइड्रोजन ईंधन का 250 साल पुराना इतिहास, इसके काम करने का तरीका और इसके सामने खड़ी बड़ी चुनौतियां।

हाइड्रोजन ट्रेन

🔬 लंदन की लैब से जींद स्टेशन तक: हाइड्रोजन का 250 साल पुराना सफर

जिस हाइड्रोजन को आज हम भविष्य का ईंधन मान रहे हैं, उसका सफर आज से करीब ढाई सौ साल पहले शुरू हुआ था:

  • 1776 में खोज: लंदन की एक लैब में वैज्ञानिक हेनरी कैवेंडिश ने जब जिंक धातु को तेजाब में डाला, तो कुछ रंगहीन बुलबुले उठे। इसमें चिंगारी लगाने पर ‘भम्म’ की आवाज के साथ पानी की बूंदें बनीं। यहीं से पता चला कि पानी असल में हाइड्रोजन और ऑक्सीजन से मिलकर बना है।
  • नामकरण: फ्रांस के एक केमिस्ट ने ग्रीक भाषा के दो शब्दों ‘हाइड्रो’ (पानी) और ‘जेनस’ (जन्मा) को मिलाकर इसका नाम ‘हाइड्रोजन’ रखा, जिसका अर्थ है ‘पानी से जन्मा’।
  • फ्यूल सेल का आविष्कार: 1838 में वैज्ञानिक विलियम ग्रोव ने हाइड्रोजन और ऑक्सीजन को मिलाकर बिजली पैदा करने वाली मशीन बनाई, जिसे ‘गैस बैटरी’ कहा गया। यही दुनिया का पहला फ्यूल सेल था, इसलिए ग्रोव को ‘फादर ऑफ द फ्यूल सेल’ कहा जाता है।

⚠️ इतिहास का काला पन्ना: हिंडनबर्ग हादसा (1937)

1937 में हाइड्रोजन गैस से भरा ‘हिंडनबर्ग’ नाम का एक विशालकाय जर्मन एयरशिप लैंड करते समय अचानक आग का गोला बन गया, जिसमें 36 लोगों की जान चली गई। हाइड्रोजन के अत्यधिक ज्वलनशील होने के कारण लंबे समय तक इसे ‘खतरनाक’ मानकर इसके प्रयोग बंद कर दिए गए थे। लेकिन 1973 के वैश्विक तेल संकट के बाद दुनिया ने फिर से इसे एक गंभीर विकल्प के रूप में देखना शुरू किया।

⚙️ कैसे काम करती है हाइड्रोजन ट्रेन? (The Science Behind It)

आवर्त सारणी (Periodic Table) का सबसे पहला और ब्रह्मांड में सबसे ज्यादा पाया जाने वाला तत्व हाइड्रोजन (H2) प्रकृति में कभी अकेला नहीं मिलता। यह हमेशा पानी ($H_2O$) के रूप में ऑक्सीजन के साथ जुड़ा रहता है। पानी में बिजली का करंट दौड़ाकर हाइड्रोजन और ऑक्सीजन को अलग करने की प्रक्रिया को इलेक्ट्रोलिसिस (Electrolysis) कहा जाता है।

ट्रेन के भीतर बिजली बनाने का फॉर्मूला

साधारण इलेक्ट्रिक ट्रेनें जहां ग्रिड की बिजली पर निर्भर होती हैं, वहीं हाइड्रोजन ट्रेन अपनी बिजली खुद बनाती है। ट्रेन की छत पर कनाडा की अग्रणी कंपनी ‘बैलार्ड’ (Ballard) का बनाया हुआ फ्यूल सेल लगा है। यह फ्यूल सेल टैंक से आने वाली हाइड्रोजन और हवा की ऑक्सीजन के बीच रासायनिक क्रिया कराता है, जिससे भारी मात्रा में बिजली पैदा होती है। इस पूरी प्रक्रिया का एकमात्र बाय-प्रोडक्ट पानी और उसकी भाप होता है, जिससे प्रदूषण का स्तर बिल्कुल ‘शून्य’ रहता है।

📊 हाइड्रोजन के तीन रंग: कौन सा है सबसे साफ?

हाइड्रोजन खुद भले ही प्रदूषण न फैलाए, लेकिन इसे बनाने की प्रक्रिया के आधार पर इसे तीन श्रेणियों में बांटा जाता है:

हाइड्रोजन का प्रकारकैसे बनाई जाती है?पर्यावरण पर प्रभाव
ग्रे हाइड्रोजन (Grey)कोयले या प्राकृतिक गैस (Natural Gas) की मदद से।इसमें भारी मात्रा में कार्बन उत्सर्जन होता है।
ब्लू हाइड्रोजन (Blue)गैस से बनती है, लेकिन निकलने वाले कार्बन को जमीन के नीचे स्टोर (Capture) कर लिया जाता है।पर्यावरण के लिए ठीक, लेकिन पूरी तरह साफ नहीं।
ग्रीन हाइड्रोजन (Green)सौर ऊर्जा या पवन ऊर्जा (रिन्यूएबल एनर्जी) से बनी बिजली के जरिए पानी का इलेक्ट्रोलिसिस करके।100% साफ और प्रदूषण मुक्त। भारत की इस ट्रेन का अंतिम लक्ष्य यही है।

📈 रूट का गणित और जींद का अत्याधुनिक चिलर प्लांट

  • रूट और खर्च: इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, यह ट्रेन जींद-सोनीपत रूट पर रोजाना दो राउंड ट्रिप (कुल 356 किमी) लगाएगी। इस सफर में करीब 300 किलोग्राम हाइड्रोजन की खपत होगी, जबकि ट्रेन अपने साथ कुल 440 किलोग्राम का बैकअप लेकर चलेगी।
  • विशेष फ्यूलिंग स्टेशन: हाइड्रोजन को बेहद उच्च दबाव (200 से 500 गुना ज्यादा) पर स्टोर करना पड़ता है। इसके लिए रेलवे ने जींद में एक विशेष फ्यूलिंग फैसिलिटी बनाई है, जो 3,000 किलोग्राम हाइड्रोजन स्टोर कर सकती है।
  • माइनस 15 डिग्री का तापमान: इसके साथ एक विशेष ‘चिलर प्लांट’ लगाया गया है, जो हाइड्रोजन को -15°C तक ठंडा रखता है ताकि उसे लिक्विड रूप में ट्रेन में आसानी से रिफ्यूल किया जा सके।

🚧 भविष्य का ईंधन या महंगा सौदा? क्या हैं बड़ी चुनौतियां?

भले ही यह तकनीक देखने में जादुई लगती हो, लेकिन इसके वैश्विक स्तर पर बड़े पैमाने पर सफल होने में अभी कई रोड़े हैं:

  1. अत्यधिक लागत: 1 किलोग्राम हाइड्रोजन बनाने में लगभग 50 यूनिट बिजली खर्च होती है, जबकि इसकी ऊर्जा क्षमता सिर्फ 3.5 लीटर पेट्रोल के बराबर है। यानी यह अभी भी बहुत महंगा ईंधन है।
  2. दुनिया का बदलता रुख: 2018 में जर्मनी ने दुनिया की पहली कमर्शियल हाइड्रोजन पैसेंजर ट्रेन चलाई थी, लेकिन 2024 के अंत तक उसने अपनी कई हाइड्रोजन ट्रेनों को हटाकर उनकी जगह ‘बैटरी से चलने वाली ट्रेनों’ को तवज्जो दी क्योंकि वे ज्यादा सस्ती और व्यावहारिक थीं। चीन, जापान और अमेरिका में भी यह तकनीक अभी छोटी दूरी के ट्रायल्स तक ही सीमित है।

📝 ‘सच का समय’ का नजरिया: क्या भारत में सफल होगा यह दांव?

भारत में भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन का यह प्रयोग एक ऐतिहासिक मील का पत्थर है। अगर जींद-सोनीपत रूट पर यह पायलट प्रोजेक्ट आर्थिक और तकनीकी रूप से सफल रहता है, तो आने वाले समय में देश के खूबसूरत पहाड़ी और हेरिटेज रूट्स (जैसे कालका-शिमला, दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे) पर इन पर्यावरण-अनुकूल ट्रेनों को चलाया जा सकेगा, जहाँ डीजल इंजनों का धुआं वादियों को नुकसान पहुंचा रहा है। भारत के पास अपनी ‘नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन’ के तहत इस तकनीक को सस्ता और सुलभ बनाने का एक बड़ा मौका है।

(देश के बुनियादी ढांचे, आधुनिक तकनीक और आपकी परीक्षाओं के लिए उपयोगी ऐसी ही प्रामाणिक और गहराई से विश्लेषित खबरों के लिए हमारी वेबसाइट sachkasameynews.in को रोज़ाना विज़िट करें और इस ज्ञानवर्धक पोस्ट को अपने दोस्तों के साथ शेयर करें।)

Abhishek Ranga is the founder and editor-in-chief of Sach Ka Samay News. With a commitment to journalistic integrity, he focuses on delivering accurate, unbiased, and real-time news to the public. He oversees the digital strategy and content management for the portal, ensuring that every story meets the highest standards of reporting