भारत और उसके पड़ोसी देश नेपाल के रिश्तों में एक बार फिर कूटनीतिक गरमाहट देखने को मिल रही है। मार्च 2026 में नेपाल में हुए ऐतिहासिक चुनावों के बाद सत्ता में आए देश के सबसे युवा प्रधानमंत्री बालेन शाह ने संसद में एक ऐसा बयान दे दिया है, जिसने दोनों देशों के राजनयिक गलियारों में हड़कंप मचा दिया है।
31 मई 2026 को संसद में अपने पहले भाषण के दौरान सीमा विवाद पर जवाब देते हुए पीएम बालेन शाह ने दावा किया कि न केवल भारत ने नेपाल की जमीन पर कब्जा किया है, बल्कि नेपाल ने भी कई जगहों पर भारत की जमीन पर कब्जा कर रखा है। इसके साथ ही उन्होंने इस मामले में ब्रिटिश (UK) सरकार को भी घसीटने की वकालत की। इस बयान के बाद नेपाल की संसद में भारी हंगामा शुरू हो गया और विपक्ष ने उनसे तुरंत माफी मांगने व बयान को रिकॉर्ड से हटाने की मांग की है।
1. क्या वाकई नेपाल ने की है भारत की जमीन पर कब्जा? समझें असलियत
मामले को तूल पकड़ता देख नेपाल के विदेश मंत्रालय को तुरंत सफाई जारी करनी पड़ी। मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि प्रधानमंत्री का मतलब किसी सैन्य कब्जे से नहीं, बल्कि ‘क्रॉस-बॉर्डर ऑक्यूपेशन’ (Cross-Border Occupation) से था।
1,751 किमी लंबी खुली सीमा ➔ कई इलाकों में फेंसिंग और पिलायर्स का न होना ➔ दोनों तरफ के स्थानीय नागरिकों द्वारा 'नो मेंस लैंड' (दसगजा) पर अतिक्रमण ➔ खेती और अस्थायी निर्माण
दरअसल, भारत और नेपाल के बीच 1,751 किलोमीटर लंबी खुली सीमा है। समतल मैदानी इलाकों में दोनों देशों के बीच 10-10 गज की एक पट्टी होती है जिसे ‘नो मेंस लैंड’ या ‘दसगजा’ कहा जाता है। नियम के मुताबिक यहाँ कोई निर्माण या खेती नहीं हो सकती, लेकिन सीमावर्ती इलाकों (जैसे बिहार के पश्चिमी चंपारण और उत्तराखंड के चंपावत) में स्थानीय लोग पिलर न होने का फायदा उठाकर इस जमीन पर खेती और मवेशी बांधने का काम कर लेते हैं। साल 2018 में SSB की रिपोर्ट में भी पश्चिमी चंपारण के पास करीब 7100 एकड़ इलाके में ऐसे ही स्थानीय अतिक्रमण की बात सामने आई थी।
2. खुद के जाल में फंसे बालेन शाह: यह दावा नेपाल को कैसे पहुंचाएगा नुकसान?
फॉरेन एक्सपर्ट्स का मानना है कि आंदोलन से उभरे 35 वर्षीय युवा नेता बालेन शाह का यह बयान अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में उनकी नासमझी को दिखाता है। इस दावे से नेपाल को 3 बड़े नुकसान होने तय हैं:
- नेपाल की कूटनीतिक स्थिति कमजोर हुई: नेपाल अब तक लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी विवाद में खुद को ‘विक्टिम’ (पीड़ित) के तौर पर पेश करता आया है। लेकिन पीएम के इस कबूलनामे के बाद कि ‘नेपाल ने भी भारत की जमीन दबाई है’, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उसका पक्ष बेहद कमजोर हो जाएगा।
- तीसरे देश (ब्रिटेन) के दखल का आइडिया फ्लॉप: बालेन शाह ने इस विवाद में यूके सरकार को शामिल करने की कोशिश की, लेकिन काठमांडू में ब्रिटिश राजदूत रॉब फेन ने साफ कह दिया कि यह भारत-नेपाल का द्विपक्षीय मामला है। भारत भी इसमें किसी तीसरे देश का हस्तक्षेप स्वीकार नहीं करता।
- विश्वसनीयता पर उठे सवाल: पीएम के इस अपरिपक्व बयान के कारण खुद उनके देश के पूर्व उपप्रधानमंत्री कमल थापा और विपक्षी दलों ने उन्हें आड़े हाथों लिया है, जिससे उनकी घरेलू साख को बट्टा लगा है।
3. पीएम बनते ही भारत के प्रति बालेन शाह का कड़ा और चौंकाने वाला रुख
पारंपरिक कूटनीति को झटका: प्रधानमंत्री बनने के बाद पिछले 65 दिनों में बालेन शाह ने कई ऐसे कदम उठाए हैं जो भारत के प्रति उनकी बेरुखी को दर्शाते हैं। उन्होंने परंपरा के विपरीत भारतीय राजदूत को कोई विशेष तरजीह न देते हुए सभी राजदूतों से सामूहिक मुलाकात की। इसके अलावा, मई 2026 में भारत के आधिकारिक न्योते को लेकर आ रहे भारतीय विदेश सचिव विक्रम मिसरी को उन्होंने मिलने का समय नहीं दिया, जिसके कारण दौरा रद्द करना पड़ा। यही नहीं, उन्होंने कार्यभार संभालते ही एलान कर दिया कि वे अपने पहले साल किसी भी विदेशी दौरे (जिसमें पारंपरिक रूप से भारत पहला देश होता है) पर नहीं जाएंगे।
4. इतिहास के झरोखे से: क्या है 210 साल पुराना भारत-नेपाल सीमा विवाद?

भारत और नेपाल के बीच मुख्य विवाद उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में स्थित लिम्पियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी को लेकर है। यह पूरा विवाद लगभग 338 वर्ग किलोमीटर के इलाके से जुड़ा है और इसकी जड़ें 210 साल पुरानी हैं।
- सुगौली समझौता (1816): एंग्लो-नेपाल युद्ध के बाद ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल के राजा के बीच सुगौली संधि हुई थी। इसके तहत काली नदी को दोनों देशों की पश्चिमी सीमा मान लिया गया।
- नदी के उद्गम का विवाद: काली नदी एक पहाड़ी नदी है जिसकी दो मुख्य धाराएं हैं। भारत पूर्वी धारा को नदी का असली उद्गम मानता है और इस लिहाज से कालापानी और लिपुलेख भारत का हिस्सा हैं। वहीं, नेपाल पश्चिमी धारा को उद्गम मानकर लिम्पियाधुरा तक अपना दावा ठोकता है।
रणनीतिक रूप से यह इलाका भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यहाँ के लिपुलेख दर्रे से होकर ही कैलाश मानसरोवर की यात्रा गुजरती है और यहाँ से चीनी सेना पर नजर रखना बेहद आसान है। यही वजह है कि चीन अक्सर नेपाल के कम्युनिस्ट धड़े को भारत के खिलाफ उकसाने का काम करता रहा है।
भारत सरकार के विदेश मंत्रालय (MEA) द्वारा भारत-नेपाल द्विपक्षीय संबंधों और आधिकारिक बयानों को विस्तार से पढ़ने के लिए आप Ministry of External Affairs, India की आधिकारिक वेबसाइट देख सकते हैं।



