देश में हरित ईंधन (Green Fuel) और किसानों की आय बढ़ाने के नाम पर पेट्रोल में एथेनॉल की ब्लेंडिंग (Ethanol Blending) को तेजी से बढ़ावा दिया जा रहा है। हाल ही में सरकार ने E20 (20% एथेनॉल) के बाद फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों के लिए E85 (85% एथेनॉल) भी लॉन्च कर दिया है। लेकिन जमीन पर इस नीति का एक बेहद डरावना और नुकसानदेह पहलू सामने आ रहा है।
दिल्ली के सबसे बड़े कार रिपेयरिंग मार्केट (पालिका भवन) के मैकेनिक्स और ऑटोमोटिव एक्सपर्ट्स का दावा है कि पेट्रोल में एथेनॉल से भारी नुकसान हो रहा है। वाहनों के फ्यूल टैंक में काली फंगस जम रही है, इंजन में जंग लग रहा है और लोगों की गाड़ियां समय से पहले कबाड़ बन रही हैं। sachksameynews.in की इस खोजी और बेबाक रिपोर्ट में पढ़िए एथेनॉल का पूरा सच, जल संकट की भयावहता और इस मुद्दे पर सरकार के बड़बोलेपन का पूरा विश्लेषण।
टेबल ऑफ कंटेंट (Table of Content)
- 1. ग्राउंड रिपोर्ट: गाड़ियों के फ्यूल टैंक में जमी काली फंगस और काई
- 2. बाइक और कारों में आ रही हैं ये 5 बड़ी तकनीकी खराबी
- 3. पर्यावरण के नाम पर जल संकट: 1 लीटर एथेनॉल के लिए 2860 लीटर पानी बर्बाद!
- 4. सरकार की बेशर्मी: एथेनॉल पर सवाल उठाने वाले नितिन गडकरी की नजर में ‘एंटी-नेशनल’?
- 5. ईडी-सीबीआई का खौफ: क्यों खामोश है मुख्यधारा का मीडिया और सेलिब्रिटी?
1. ग्राउंड रिपोर्ट: गाड़ियों के फ्यूल टैंक में जमी काली फंगस और काई

दिल्ली के पालिका बाजार में पिछले 20 वर्षों से कार रिपेयरिंग का काम कर रहे दीपक राज और मोहसिन ने बेहद चौंकाने वाले खुलासे किए हैं। उनके मुताबिक, पिछले दो साल में गाड़ियों के फ्यूल सिस्टम से जुड़ी शिकायतें अचानक दोगुनी हो गई हैं।
नमी और फंगस का खेल: एथेनॉल में हवा से नमी (पानी) सोखने की अत्यधिक क्षमता होती है। जब एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल लंबे समय तक टैंक में रहता है, तो वह पानी छोड़ देता है। इसके कारण फ्यूल टैंक के अंदर एक काली फंगस (परत) और हरी काई जमने लगती है, जिससे फ्यूल सेंसर, हाई-प्रेशर पंप और इंजेक्टर पूरी तरह जाम होकर बैठ जाते हैं। नई गाड़ियां भी चलते-चलते अचानक बंद हो रही हैं।
मर्सिडीज, ऑडी और बीएमडब्ल्यू जैसी प्रीमियम कारों के डीलर्स का कहना है कि जो फ्यूल पंप पहले 8-10 साल चलते थे, वे अब महज 1 साल में ही पूरी तरह सड़कर कबाड़ हो रहे हैं। मयंक मलिक के मुताबिक, एथेनॉल के कारण इंजन के रबर, सील और प्लास्टिक के पार्ट्स गल रहे हैं, जिससे गाड़ियों की सर्विसिंग का सालाना खर्च 15 हजार से बढ़कर सीधे 30-40 हजार रुपए (दोगुना) हो गया है।
2. बाइक और कारों में आ रही हैं ये 5 बड़ी तकनीकी खराबी
विशेषज्ञों और बाइक मैकेनिक्स के अनुसार, जो गाड़ियां (विशेषकर पुरानी गाड़ियां) केवल शुद्ध पेट्रोल या E10 के लिए बनी थीं, उनमें E20 पेट्रोल डालने से निम्नलिखित 5 मुख्य समस्याएं आ रही हैं:
- कोल्ड स्टार्ट की समस्या: सुबह के समय या ठंड के मौसम में बाइक और कारें आसानी से स्टार्ट नहीं होतीं और बार-बार झटका मारती हैं।
- रबर और गैस्केट का गलना: अत्यधिक केमिकल रिएक्शन के कारण इंजन के अंदर लगे रबर होज, सील और गैस्केट जल्दी गलकर लीक करने लगते हैं।
- इंजन और टैंक में जंग: नमी के कारण लोहे के टैंकों में अंदर से जंग लग रहा है, जिससे पेट्रोल गंदा हो जाता है।
- माइलेज में भारी गिरावट: एथेनॉल की डेंसिटी कम होने के कारण वाहनों के औसत माइलेज में 5% से 7% तक की सीधी कमी दर्ज की गई है।
- खराब थ्रोटल रिस्पॉन्स: गाड़ियों का पिकअप और एक्सीलेटर रिस्पॉन्स कमजोर हो गया है, जिससे इंजन की परफॉर्मेंस घट गई है।
3. पर्यावरण के नाम पर जल संकट: 1 लीटर एथेनॉल के लिए हजारों लीटर पानी बर्बाद!

सरकार का दावा है कि एथेनॉल के उत्पादन से किसानों को फायदा हो रहा है, लेकिन हकीकत इसके बिल्कुल विपरीत है। भारत में एथेनॉल मुख्य रूप से गन्ने और मक्के जैसी अत्यधिक पानी सोखने वाली फसलों से तैयार किया जाता है।
एक अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में केवल 1 लीटर एथेनॉल बनाने के लिए लगभग 2860 लीटर भूजल (Groundwater) का उपयोग हो जाता है। अगर औसत गणना भी करें, तो सैकड़ों लीटर कीमती पानी सिर्फ एक लीटर ईंधन के लिए बहाया जा रहा है। इसका नतीजा यह है कि आज देश के बड़े महानगर जैसे मुंबई, बेंगलुरु और महाराष्ट्र के कई हिस्से भीषण जल संकट से जूझ रहे हैं। मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो मुंबई के पास अब बेहद सीमित दिनों का पानी शेष बचा है। जब किसानों के पास सिंचाई और आम जनता के पास पीने के लिए पानी ही नहीं बचेगा, तो इस एथेनॉल से किसका भला होगा?
4. सरकार की बेशर्मी: एथेनॉल पर सवाल उठाने वाले नितिन गडकरी की नजर में ‘एंटी-नेशनल’?
इस गंभीर तकनीकी और प्राकृतिक समस्या पर आम जनता को राहत देने के बजाय केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी का एक बेहद हैरान करने वाला रुख सामने आया है। सरकार में बेशर्मी की हदें पार करते हुए, एथेनॉल नीति की कमियों या इसके कारण गाड़ियों में आ रही खराबियों पर सवाल उठाने वाले लोगों और ऑटो एक्सपर्ट्स को परोक्ष रूप से ‘एंटी-नेशनल’ (देशद्रोही) तक करार दिया जा रहा है।
प्रशासन का तर्क है कि एथेनॉल से कच्चे तेल का आयात घट रहा है, इसलिए इस नीति का विरोध करना देश के खिलाफ है। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या अपनी गाड़ियां खराब होने पर अपनी गाढ़ी कमाई का पैसा मैकेनिक को देने वाला आम मध्यमवर्गीय नागरिक देशद्रोही है? जनता के पैसों की बर्बादी पर सरकार का यह तानाशाही रवैया लोकतंत्र की भावना के पूरी तरह विपरीत है।
5. ईडी-सीबीआई का खौफ: क्यों खामोश है मुख्यधारा का मीडिया और सेलिब्रिटी?
देश की जनता इस समय एथेनॉल ब्लेंडेड पेट्रोल के कारण अपनी जेबें कटवा रही है और शहरों में पानी की बूंद-बूंद के लिए त्राहि-त्राहि मची है। लेकिन इस असली और गंभीर जनमुद्दे पर हमारा मुख्यधारा का मीडिया (Mainstream Media) पूरी तरह मौन साधे बैठा है। प्राइम टाइम डिबेट्स से ये जरूरी मुद्दे पूरी तरह गायब हैं।
खौफ का माहौल: देश के बड़े-बड़े सेलिब्रिटी, फिल्म स्टार और प्रभावशाली लोग भी इस बर्बादी पर अपना मुंह खोलने को तैयार नहीं हैं। दरअसल, सरकार ने ईडी (ED), सीबीआई (CBI) और इनकम टैक्स का ऐसा खौफ बना रखा है कि कोई भी उद्योगपति या नामचीन हस्ती जनता के पक्ष में खड़े होकर सरकार की गलत नीतियों के खिलाफ बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही है। नतीजतन, सोशल मीडिया पर आम जनता अकेले ही वीडियो शेयर कर अपना दर्द बयां कर रही है।
पुरानी गाड़ी मालिकों के लिए ऑटोमोटिव एक्सपर्ट टूटू धवन की 3 जरूरी सलाह:
- अपनी गाड़ी को लंबे समय तक गैराज में खड़ी न रखें; बीच-बीच में उसे चलाते रहें ताकि पेट्रोल में नमी न जमे।
- समय-समय पर अपनी गाड़ी के फ्यूल फिल्टर, इंजेक्टर और टैंक की अंदरूनी सफाई मैकेनिक से जरूर करवाएं।
- एथेनॉल के विपरीत प्रभावों को कम करने के लिए पेट्रोल डलवाते समय प्रति लीटर के अनुपात में 0.5% टू-टी (2T) ऑयल का इस्तेमाल करें।
देश की इकोनॉमी, ऑटोमोबाइल सेक्टर और आम जनता से जुड़े ऐसे ही बेबाक व निष्पक्ष विश्लेषणों के लिए हमारी वेबसाइट sachksameynews.in को पढ़ते रहें। एथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम के आधिकारिक सरकारी दावों को देखने के लिए आप Ministry of Petroleum and Natural Gas की वेबसाइट भी विजिट कर सकते हैं।




