मशहूर पंजाबी अभिनेता और ग्लोबल सिंगर दिलजीत दोसांझ की बहुप्रतीक्षित फिल्म ‘सतलुज’ को लेकर एक बार फिर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। पंजाब के महान मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन और उनके संघर्षों पर आधारित इस फिल्म को रिलीज के महज दो दिन के भीतर ही ओटीटी (OTT) प्लेटफॉर्म ZEE5 से अचानक हटा दिया गया है।
यह फिल्म पिछले 3 सालों से सेंसर बोर्ड (CBFC) और कानूनी अड़चनों के कारण रुकी हुई थी और हाल ही में इसका नाम बदलकर चुपचाप रिलीज किया गया था। फिल्म को हटाए जाने के बाद पंजाब के राजनीतिक गलियारों और मनोरंजन जगत में भारी आक्रोश देखा जा रहा है।
sachkasameynews.in की इस विशेष रिपोर्ट में जानिए आखिर कौन थे जसवंत सिंह खालड़ा, क्या है इस फिल्म का इतिहास और इसे अचानक हटाए जाने पर दिलजीत दोसांझ और राजनीतिक दिग्गजों ने क्या प्रतिक्रिया दी है।
टेबल ऑफ कंटेंट (Table of Content)
- 1. ‘घल्लूघारा’ से ‘पंजाब 95’ और फिर ‘सतलुज’: जानिए फिल्म के बैन का पूरा सफर
- 2. फिल्म हटने पर दिलजीत दोसांझ का छलका दर्द: कहा- “मुझे पता था ऐसा होना है”
- 3. राजनीतिक प्रतिक्रियाएं: आप (AAP) और अकाली दल ने केंद्र व सेंसरशिप को घेरा
- 4. कौन थे जसवंत सिंह खालड़ा? जिनकी कहानी दिखाने से डर गया सिस्टम
1. ‘घल्लूघारा’ से ‘पंजाब 95’ और फिर ‘सतलुज’: जानिए फिल्म के बैन का पूरा सफर

जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर आधारित इस फिल्म की घोषणा साल 2022 में की गई थी, लेकिन शुरुआत से ही यह फिल्म विवादों और सेंसरशिप के साये में रही।
- नामों में लगातार बदलाव: फिल्म का शुरुआती नाम ‘घल्लूघारा’ (जिसका अर्थ नरसंहार होता है) रखा गया था। जब इसे सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन (CBFC) के पास भेजा गया, तो बोर्ड ने इसके टाइटल और कहानी पर गंभीर आपत्तियां जताईं। इसके बाद नाम बदलकर ‘पंजाब 95’ किया गया और आखिरकार दो दिन पहले इसे ‘सतलुज’ नाम से ZEE5 पर रिलीज किया गया था।
- 127 कट्स का विवाद: मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, सेंसर बोर्ड ने फिल्म को थिएटर्स में रिलीज करने के बदले 127 कट्स और कई ऐतिहासिक संदर्भों व स्थानों के नाम बदलने की शर्त रखी थी। कट्स न लगाने के फैसले के कारण यह भारत के सिनेमाघरों में रिलीज नहीं हो सकी, हालांकि टोरंटो इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल (TIFF 2023) में इसके वर्ल्ड प्रीमियर को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफी सराहना मिली थी।
- ZEE5 का आधिकारिक बयान: ओटीटी प्लेटफॉर्म ZEE5 ने फिल्म को अचानक हटाने के पीछे कोई स्पष्ट कारण नहीं बताया है। कंपनी के बयान में सिर्फ इतना कहा गया है कि “मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए अगले आदेश तक ‘सतलुज’ प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध नहीं रहेगी। कंपनी कानूनी प्रक्रिया के तहत सभी उचित विकल्प तलाश रही है ताकि इसे जल्द वापस लाया जा सके।”
2. फिल्म हटने पर दिलजीत दोसांझ का छलका दर्द: कहा- “मुझे पता था ऐसा होना है”
फिल्म को बिना किसी पूर्व सूचना के प्लेटफॉर्म से हटाए जाने पर मुख्य अभिनेता दिलजीत दोसांझ ने गहरा दुख और तीखा आक्रोश व्यक्त किया है।
दिलजीत दोसांझ का बयान: “एक इंसानियत होती है, वह इंसानियत मर गई। कमाल है। मुझे इस बात का दुख या उदासी नहीं है कि फिल्म इंटरनेट से हटा दी गई, क्योंकि दो दिनों में फिल्म प्रेमियों और लोगों तक पहुंच चुकी है। इंटरनेट पर एक बार जो चीज आ गई, उसे पूरी तरह मिटाना आसान नहीं है। इनके सलाहकार ठीक नहीं हैं। इस फिल्म के साथ भी वही हुआ, जो असल जिंदगी में भाई खालड़ा जी के साथ हुआ था।”
दिलजीत ने आगे अपने फैंस को बताया कि उनका एक बड़ा प्रोजेक्ट आने वाला था जो अब पूरी तरह बैन हो चुका है, और अब वे अपने अपकमिंग यूरोप टूर पर ध्यान केंद्रित करेंगे, जिसका पहला शो बर्लिन में होने जा रहा है।
3. राजनीतिक प्रतिक्रियाएं: आप (AAP) और अकाली दल ने केंद्र व सेंसरशिप को घेरा
फिल्म ‘सतलुज’ को हटाए जाने के बाद पंजाब की राजनीति गर्मा गई है और विपक्षी व सत्ताधारी दोनों ही दलों के सांसदों ने इसकी कड़ी निंदा की है।
- अकाली दल सांसद हरसिमरत कौर बादल: उन्होंने इस फैसले को बेहद दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा कि, “शहीद भाई जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर आधारित फिल्म को हटाकर पंजाब के उस काले दौर को छिपाया नहीं जा सकता, जब कांग्रेस सरकार के समय हमारे नौजवानों को जबरन घरों से उठाकर मार दिया गया था। भाई खालड़ा ने लावारिस शवों का वारिस बनकर सरकार से सवाल किए थे और इसके लिए अपनी शहादत दी।”
- ‘आप’ लोकसभा सांसद मालविंदर सिंह कंग: आम आदमी पार्टी के सांसद ने सीधे तौर पर भाजपा सरकार पर निशाना साधते हुए कहा, “जब कोई देश अपने ही इतिहास से डरने लगे, तो सेंसरशिप उसका सबसे खतरनाक हथियार बन जाती है। ‘सतलुज’ को रोककर भाजपा ने अपना असली चेहरा उजागर कर दिया है। यह पंजाब की सच्चाई को लेकर उनकी असहजता को दिखाता है। इतिहास का सामना ईमानदारी से होना चाहिए, न कि चुप्पी के जरिए।”
4. कौन थे जसवंत सिंह खालड़ा? जिनकी कहानी दिखाने से डर गया सिस्टम

जसवंत सिंह खालड़ा अमृतसर के एक सहकारी बैंक में काम करते थे और 1980 व 1990 के दशक में पंजाब में उग्रवाद के दौर के दौरान मानवाधिकार कार्यकर्ता के रूप में उभरे।
[जसवंत सिंह खालड़ा की खोज] ──► श्मशान घाटों व नगर निगम के रिकॉर्ड्स खंगाले
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[बड़ा खुलासा] ──► पंजाब में ~25,000 शवों को 'लावारिस' बताकर गुप्त अंतिम संस्कार करने का दावा
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[CBI और सुप्रीम कोर्ट का एक्शन] ──► केवल तरनतारन जिले में 2,097 अवैध अंतिम संस्कार की पुष्टि
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[6 सितंबर 1995] ──► अमृतसर स्थित घर के बाहर से खालड़ा का अपहरण और संदिग्ध परिस्थितियों में मौत
- कानूनी लड़ाई और सजा: खालड़ा के अपहरण और हत्या के मामले में सीबीआई जांच के आदेश दिए गए थे। साल 2005 में ट्रायल कोर्ट और बाद में सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब पुलिस के तत्कालीन डीएसपी जसपाल सिंह सहित 5 पुलिस अधिकारियों की उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा था। कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा था कि “पुलिस द्वारा किए गए ऐसे अत्याचार कानून के शासन पर सीधा हमला हैं।” हालांकि, इस मामले में तत्कालीन पुलिस प्रमुख केपीएस गिल को सीबीआई ने पर्याप्त सबूत न होने के कारण क्लीन चिट दे दी थी।
निष्कर्ष: दिलजीत दोसांझ की फिल्म ‘सतलुज’ का इस तरह ओटीटी से हटाया जाना अभिव्यक्ति की आजादी और सिनेमाई सेंसरशिप पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े करता है।
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