बिहार के भोजपुर (आरा) जिले के शाहपुर प्रखंड अंतर्गत बिलौटी गांव में 17 जून 2026 को हुआ भरत तिवारी एनकाउंटर लगातार तूल पकड़ता जा रहा है। एक तरफ जहां पुलिस प्रशासन इस कार्रवाई को आत्मरक्षार्थ की गई कानूनी जवाबी कार्रवाई बता रहा है, वहीं दूसरी तरफ बाढ़ और गंगा कटाव से विस्थापित हुए सैकड़ों ग्रामीणों ने पुलिस की इस थ्योरी को सिरे से खारिज कर दिया है।
इस घटना के बाद से ही क्षेत्र में तनाव का माहौल है और ‘मसीहा या अपराधी’ की इस बहस ने पूरे भोजपुर को हिला कर रख दिया है। sachksameynews.in की इस विशेष खोजी रिपोर्ट में पढ़िए ग्रामीणों की जुबानी, उस सुबह की पूरी आंखों देखी कहानी और जानिए आखिर भरत तिवारी किस मुद्दे को लेकर प्रशासन के खिलाफ खड़े थे।
टेबल ऑफ कंटेंट (Table of Content)
- 1. क्या हुआ था 17 जून की सुबह? ग्रामीणों की आंखों देखी
- 2. ‘सामने 3 गोली मारी, 5 कैसे निकली?’: एनकाउंटर पर बड़े सवाल
- 3. किस मुद्दे को लेकर लड़ाई लड़ रहे थे भरत तिवारी?
- 4. मसीहा या अपराधी: जनता और प्रशासन का क्या है रुख?
1. क्या हुआ था 17 जून की सुबह? ग्रामीणों की आंखों देखी
गंगा नदी के भीषण कटाव के कारण विस्थापित होकर बिलौटी गांव के पास प्रशासन द्वारा बसाए गए बाढ़ पीड़ितों के मोहल्ले में 17 जून (बुधवार) की सुबह सामान्य रूप से शुरू हुई थी। लेकिन करीब 8:30 बजे अचानक वहां पुलिस की 7 से 8 गाड़ियां आ पहुंचीं।

17 जून को एनकाउंटर से ठीक पहले पुलिस के सामने खड़ा भरत तिवारी।

17 जून की सुबह करीब 8 बजकर 45 मिनट पर भरत तिवारी ने हथियार फेंककर सरेंडर कर दिया था।
- सोशल मीडिया लाइव और पिस्टल: ग्रामीणों के मुताबिक, उस समय भरत तिवारी वहां मौजूद विस्थापितों की समस्याएं सुन रहे थे। पुलिस को देखकर वे आगे बढ़े। उनके एक हाथ में मोबाइल था, जिस पर वे सोशल मीडिया लाइव कर रहे थे, और दूसरे हाथ में एक पिस्टल थी।
- फायरिंग की शुरुआत: चश्मदीद ललिता देवी और अंजलि देवी ने बताया कि पुलिस ने आते ही ताबड़तोड़ फायरिंग शुरू कर दी। पुलिस की तरफ से 20 से अधिक राउंड गोलियां चलीं। वहीं, भरत तिवारी ने केवल 3 फायर किए— जिनमें से दो जमीन पर और एक हवाई फायरिंग थी, जो वे केवल पुलिस को डराने के लिए कर रहे थे।
- सरेंडर के बाद गिरफ्तारी: हवाई फायरिंग के तुरंत बाद भरत तिवारी ने अपने दोनों हाथ खड़े कर दिए, पिस्टल जमीन पर फेंक दी और पुलिस के सामने पूरी तरह सरेंडर (आत्मसमर्पण) कर दिया।
2. ‘सामने 3 गोली मारी, 5 कैसे निकली?’: एनकाउंटर पर बड़े सवाल
प्रत्यक्षदर्शी महिलाओं और बच्चों का आरोप है कि हथियार फेंक देने के बावजूद पुलिसकर्मियों ने दौड़कर भरत तिवारी को दबोच लिया।
दौड़कर पकड़ा, दूर ले जाकर दागी बुलेट: ग्रामीणों ने छिपकर देखा कि पुलिस उन्हें पकड़कर कुछ दूरी पर ले गई और उन पर गोलियां दाग दीं। विस्थापितों का दावा है कि उनके सामने पुलिस ने भरत को 3 गोलियां मारी थीं। इसके बाद उन्हें घसीटकर पुलिस की गाड़ी में लाद दिया गया।
जब पोस्टमार्टम के बाद डॉक्टरों ने शव में 5 गोलियां लगने की पुष्टि की, तो ग्रामीणों ने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि अगर डॉक्टरों को 5 गोलियां मिली हैं, तो इसका सीधा मतलब है कि सरेंडर के बाद रास्ते में ले जाते समय पुलिस ने उन्हें 2 और गोलियां मारी होंगी। इसी मांग को लेकर परिजनों और ग्रामीणों ने 18 जून को शव को सड़क पर रखकर लंबा जाम भी लगाया था।
3. किस मुद्दे को लेकर लड़ाई लड़ रहे थे भरत तिवारी?
भोजपुर के शाहपुर प्रखंड का जवइनियां गांव पिछले साल (अगस्त-सितंबर) गंगा के तेज कटाव में पूरी तरह विलीन हो गया था। 600 से अधिक घर और गांव के सभी स्कूल नदी में समा गए थे।

जवइनिया गांव में 800 में से करीब 650 से ज्यादा घर इसी तरह गंगा में समा गए थे।
विस्थापितों की वर्तमान स्थिति और भरत की मांगें |
| प्रशासनिक लापरवाही: सरकार ने विस्थापित 70 परिवारों को बिलौटी के पास एक निचले (गड्ढे वाले) इलाके में 3-3 डिसमिल जमीन और ₹40-40 हजार देकर छोड़ दिया। |
| मूलभूत सुविधाओं का अभाव: थोड़ी सी बारिश में ही लोगों के घरों में पानी घुस जाता है। यहां न तो बच्चों के लिए स्कूल की व्यवस्था है और न ही बिजली-पानी की उचित व्यवस्था थी। |
| प्रशासन से टकराव: भरत तिवारी लगातार इन गरीबों के हक के लिए जिला प्रशासन से लड़ रहे थे। उन्होंने अपने निजी खर्च और दबाव से यहां बिजली-पानी की व्यवस्था बहाल कराई थी। वे लगातार प्रशासन पर विस्थापितों के क्षेत्र में मिट्टी भराई कराने और स्कूल खुलवाने का दबाव बना रहे थे। |
ग्रामीणों के अनुसार, जब प्रशासन ने भरत तिवारी की जायज मांगों को सुनने के बजाय उन्हें मानसिक रूप से विक्षिप्त (पागल) घोषित करने की कोशिश शुरू की, तब तंग आकर उन्होंने सिस्टम को डराने के लिए हथियार (पिस्टल) उठाया था। उनकी मां के मुताबिक, भरत ने अपनी सुरक्षा के लिए अपने गले का महावीरी लॉकेट बेचकर वह पिस्टल खरीदी थी।
4. मसीहा या अपराधी: जनता और प्रशासन का क्या है रुख?
इस एनकाउंटर के बाद से ही सोशल मीडिया और जमीन पर बहस छिड़ गई है कि भरत तिवारी कानून तोड़ने वाले एक अपराधी थे या फिर गरीबों के हक के लिए जान देने वाले एक क्रांतिकारी।
- ग्रामीणों का पक्ष (मसीहा रूप): 12 साल के अंकुर और योगेंद्र चौधरी सहित सभी विस्थापितों का स्पष्ट कहना है कि, “अगर भरत तिवारी अपराधी या पागल होते, तो वे हमारे बच्चों के स्कूल और चापाकल के पानी के लिए क्यों लड़ते? वे हमारे लिए भगवान और मसीहा थे, जिन्होंने गरीबों के हक के लिए अपनी जान दे दी।” जनता उनकी तुलना तंत्र से लड़ने वाले एक क्रांतिकारी से कर रही है।
- पुलिस और कानून का पक्ष: पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार, हाथ में अवैध हथियार लेकर घूमना, पुलिस बल पर फायरिंग करना और कानून को अपने हाथ में लेना एक गंभीर अपराध है। पुलिस का तर्क है कि स्थिति को नियंत्रित करने और आत्मरक्षार्थ गोली चलाना उनकी कानूनी मजबूरी थी।
निष्कर्ष: कानूनन किसी भी नागरिक का हाथ में हथियार उठाना सही नहीं ठहराया जा सकता, लेकिन निहत्थे होकर सरेंडर करने के बाद किसी को गोली मारना भी देश के संवैधानिक नियमों के खिलाफ है। इस एनकाउंटर की निष्पक्ष न्यायिक जांच ही सच सामने ला सकती है कि इस घटनाक्रम की हर कड़ी में वास्तव में क्या हुआ था।
बिहार की कानून व्यवस्था और आपराधिक मामलों के लाइव अपडेट्स के लिए हमारी वेबसाइट sachksameynews.in को फॉलो करें। इस मामले में मानवाधिकारों और कानूनी प्रक्रियाओं की विस्तृत जानकारी के लिए आप National Human Rights Commission (NHRC) की आधिकारिक गाइडलाइंस भी देख सकते हैं।



