पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद नवगठित भारतीय जनता पार्टी (BJP) सरकार के एक बड़े फैसले ने राज्य के पशु हाट बाजारों और सीमांत किसानों के बीच भारी हलचल पैदा कर दी है। आज यानी 28 मई 2026 को देश भर में बकरीद (ईद-उल-अजहा) का त्योहार मनाया जा रहा है, लेकिन बंगाल सरकार द्वारा ऐन वक्त पर जारी किए गए एक कड़े आदेश के कारण इस बार त्योहार का रंग पूरी तरह बदला हुआ है।

दरअसल, सरकार ने बकरीद से महज 15 दिन पहले (13 मई को) एक नोटिस जारी किया, जिसमें गोहत्या से जुड़े 1950 के कानून और 2018 के कलकत्ता हाईकोर्ट के आदेश का हवाला देते हुए साफ कर दिया गया कि बिना आधिकारिक ‘फिटनेस सर्टिफिकेट’ के किसी भी गाय या भैंस की कुर्बानी नहीं दी जाएगी। सरकार के इस फैसले से जहां मुस्लिम समाज में असमंजस है, वहीं इसका सबसे बड़ा और तीखा विरोध बंगाल के हिंदू पशु व्यापारियों और दलित किसानों की ओर से देखने को मिल रहा है।
1. बंगाल में नया नियम: बकरीद से ठीक पहले सरकार के फैसले से हड़कंप

कोलकाता के खिदिरपुर में बकरीद पर बकरों और भेड़ों का बाजार लगा। यहां 16 हजार रुपए से लेकर 25 हजार रुपए तक के बकरे बिके।
पश्चिम बंगाल में पशु व्यापार और ग्रामीण अर्थव्यवस्था एक-दूसरे से बेहद बारीकी से जुड़े हुए हैं। राज्य के पूर्व मेदिनीपुर, हावड़ा और मुर्शिदाबाद जैसे जिलों में बड़े पैमाने पर हिंदू और दलित परिवार सालों से बकरीद के बाजार को ध्यान में रखकर मवेशियों का पालन-पोषण करते आ रहे हैं।
अचानक आए इस नए नियम ने उन हजारों किसानों को अधर में लटका दिया है जिन्होंने इस सीजन में मुनाफा कमाने और अपने बैंकों का कर्ज चुकाने के लिए साल भर पहले लाखों रुपये का लोन लेकर गाय और भैंसें खरीदी थीं।
2. हिंदू व्यापारियों का फूटा गुस्सा: ‘मुसलमानों को सबक सिखाने के चक्कर में हमारा नुकसान हुआ’
पूर्व मेदिनीपुर के सिलीपल्ली और शहीद महतो मिनी ब्लॉक में ग्राउंड रिपोर्टिंग के दौरान पशु व्यापार से जुड़े हिंदू परिवारों का दर्द और गुस्सा साफ तौर पर बाहर आ गया।
ममता दीदी की नीतियों से परेशान होकर लाए बदलाव ➔ जय श्री राम के नारे के साथ चुनी नई सरकार ➔ ऐन बकरीद पर आया नया नियम ➔ हिंदुओं का ₹2500 करोड़ का व्यापार ठप
स्थानीय किसान सुखदेव मंडल और श्यामल मंडल ने रुंधे गले से बताया, “हमने दीदी की 15 साल की खराब नीतियों से तंग आकर राज्य में सरकार बदली थी। हम ‘जय श्री राम’ बोलकर राज्य में नई सरकार (शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व वाली) लेकर आए, लेकिन भाजपा सरकार की इस नीति ने सीधे हमारे पेट पर लात मार दी है। अब लगता है कि इन्हें भी बदलना पड़ेगा।”
किसानों का कहना है कि कुर्बानी भले ही मुस्लिम देते हैं, लेकिन इसका 80% व्यापार ग्रामीण हिंदू करते हैं। ग्रामीण दलित हिंदुओं ने अपने घरों में 8 से 10 गायें पाल रखी थीं, जिनके चारे-पानी के लिए उन्होंने अपनी पत्नियों के गहने गिरवी रखे और बैंकों से 10 लाख रुपये तक का कर्ज लिया।
3. ₹2,500 करोड़ का पशु बाजार ठप: कर्ज के जाल में फंसे छोटे किसान
आंकड़ों के अनुसार, पश्चिम बंगाल में पशु हाट बाजारों से लगभग 3.7 करोड़ लोगों की रोजी-रोटी सीधे और परोक्ष रूप से जुड़ी हुई है। बकरीद के दौरान चलने वाले तीन हफ्तों के बाजार में करीब ₹2,000 से ₹2,500 करोड़ का कारोबार होता है। अकेले कोलकाता और उसके आसपास के खिदिरपुर व संकराली जैसे इलाकों में रोजाना 1 से 2 करोड़ रुपये का बिजनेस होता है।
हावड़ा के संकराली में दूध का व्यापार करने वाली सोमा सुधका और वरुण घोष ने बताया कि जब डेयरी की गायें बूढ़ी हो जाती हैं या दूध देना बंद कर देती हैं, तो वे उन्हें इस बाजार में बेचकर नई गायें खरीदते हैं। लेकिन फिटनेस सर्टिफिकेट के नए नियमों और दक्षिणपंथी संगठनों की कथित धमकियों के चलते व्यापारी डरे हुए हैं और एडवांस में लिया गया पैसा वापस मांग रहे हैं।
4. मुस्लिम पक्ष की मजबूरी: बकरों के दाम हुए दोगुने, कई घरों में इस बार कुर्बानी नहीं
बंगाल में गाय की कुर्बानी पर रोक का सीधा असर बकरा बाजार पर भी देखने को मिल रहा है। मुर्शिदाबाद के बेलडांगा निवासी समीम रहमान और रहमान शेख ने बताया कि पहले मध्यम वर्ग के कई मुस्लिम परिवार मिलकर (हिस्सेदारी में) बड़े मवेशी की कुर्बानी कर लेते थे, जिससे उनका खर्च कम आता था।
लेकिन गायों की बिक्री पर रोक लगने के कारण कोलकाता के खिदिरपुर समेत अन्य बाजारों में बकरों की मांग अचानक आसमान छूने लगी है। सामान्य बकरे भी अब 16 हजार से लेकर 25 हजार रुपये तक में बिक रहे हैं। दाम दोगुने हो जाने के कारण इस बार बंगाल के कई मुस्लिम परिवारों में कुर्बानी नहीं हो पा रही है।
5. मुस्लिम संगठनों का रुख: इमामों ने मस्जिदों से किया गाय की कुर्बानी न करने का ऐलान

इस पूरे विवाद के बीच सामाजिक सौहार्द बनाए रखने के लिए कई बड़े मुस्लिम संगठनों ने बड़ा कदम उठाया है। ऑल इंडिया इमाम मुअज्जिन एंड सोशल वेलफेयर ऑर्गनाइजेशन (AIIMSWO) के स्टेट जनरल सेक्रेटरी मौलाना अब्दुर रज्जाक ने बताया:
संगठनों की अपील: “हमने राज्य के सभी 26 जिलों की मस्जिदों से बाकायदा यह ऐलान करवाया है कि इस बार बकरीद पर कोई भी व्यक्ति गाय की कुर्बानी नहीं देगा। कुरान में भी कहीं अनिवार्य रूप से गाय की कुर्बानी का जिक्र नहीं है। जो सक्षम हैं, वे बकरे या भेड़ की कुर्बानी दे रहे हैं। अगर कोई जानबूझकर कानून तोड़ेगा, तो हम खुद उसका विरोध करेंगे।”
हालांकि, मौलानाओं ने सरकार से यह भी मांग की है कि नियम पूरी तरह निष्पक्षता से लागू होने चाहिए, ऐसा न हो कि छोटे व्यापारियों को रोककर मवेशियों को पिछले दरवाजे से कहीं और सप्लाई कर दिया जाए। पश्चिम बंगाल पशुपालन विभाग के पिछले आंकड़ों (2025) के मुताबिक, राज्य में सालाना मांस के लिए करीब 4.76 करोड़ बकरे और 1.33 लाख से अधिक गोवंश का उपयोग होता था, जो इस नए फैसले के बाद पूरी तरह प्रभावित होने जा रहा है।




