अक्सर जब हम ‘Cloud Computing’ की बात करते हैं, तो हमें लगता है कि हमारा डेटा आसमान में कहीं बादलों के बीच तैर रहा है। लेकिन internet ka asli sach इससे बिल्कुल उलट है। आपका हर व्हाट्सएप मैसेज, हर यूट्यूब वीडियो और हर बैंक ट्रांजेक्शन समुद्र की गहराई में बिछी 13 लाख किलोमीटर लंबी केबल्स के जरिए सफर करता है। जिन्हें हम Submarine Cables या Optical Fiber Cables कहते हैं।अगर आज ये सारी तारें काट दी जाएं, तो पूरी दुनिया का डिजिटल सिस्टम चंद सेकंडों में ढेर हो जाएगा।
ऑप्टिक फाइबर केबल: कांच के धागे में दौड़ती रोशनी


ऑप्टिक फाइबर केबल कोई साधारण तार नहीं है। यह इंसान के बाल जितनी पतली कांच की रेशों से बनी होती है। इसके पीछे की साइंस बहुत ही दिलचस्प है जिसे Total Internal Reflection (TIR) कहा जाता है।
कैसे काम करती है ये साइंस?
जब हम इंटरनेट पर कुछ सर्च करते हैं, तो वह डेटा बिजली के सिग्नल से रोशनी (Light Signals) में बदल दिया जाता है। यह रोशनी इन कांच की पाइपों के अंदर टकराती हुई (Bounce करती हुई) हजारों किलोमीटर का सफर तय करती है। रोशनी की रफ्तार सबसे तेज होती है, इसीलिए इंटरनेट इतना फास्ट चलता है।
समुद्र के नीचे कैसे बिछता है तारों का जाल?
internet ka asli sach यह भी है कि समुद्र के अंदर इन केबल्स को बिछाना दुनिया के सबसे कठिन कामों में से एक है।

बड़ी नावें (Cable Ships): खास किस्म के जहाजों का इस्तेमाल किया जाता है जो हजारों किलोमीटर लंबी केबल अपने साथ ले जाते हैं।समुद्री हल (Sea Plow): समुद्र की गहराई में एक रोबोटिक हल चलाया जाता है जो जमीन खोदकर केबल को अंदर दबा देता है ताकि मछलियां या शार्क इसे नुकसान न पहुंचा सकें।रिपीटर्स: चूंकि सिग्नल हजारों किलोमीटर दूर जाना होता है, इसलिए बीच-बीच में ‘एम्पलीफायर’ लगाए जाते हैं जो कमजोर पड़ती रोशनी को फिर से ताकत देते हैं।
आइए जानते हैं इंटरनेट की इस गुप्त दुनिया के वो राज जो शायद ही कोई जानता हो।समुद्र में शार्क के हमले और ₹4000 करोड़ की एक तार! जानें वो राज जो आपको दंग कर देंगे
1. क्या शार्क को पसंद है इंटरनेट का स्वाद?

यह सुनने में फिल्मी लग सकता है, लेकिन internet ka asli sach यह है कि समुद्र के नीचे बिछी इन कीमती केबल्स का सबसे बड़ा दुश्मन ‘शार्क’ है।
- मैग्नेटिक फील्ड: वैज्ञानिकों का मानना है कि इन केबल्स से निकलने वाली हल्की मैग्नेटिक फील्ड शार्क को किसी मछली की तरह लगती है।
- केबल प्रोटेक्शन: शार्क के हमलों से बचने के लिए अब इन फाइबर ऑप्टिक केबल्स को ‘Kevlar’ (जिससे बुलेटप्रूफ जैकेट बनती है) की परतों से ढका जाता है।
2. एक तार टूटी और पूरा देश ठप!
क्या आप जानते हैं कि साल 2008 और 2011 में भूमध्य सागर (Mediterranean Sea) में केबल्स कटने की वजह से भारत, मिस्र और मध्य पूर्व का आधा इंटरनेट बंद हो गया था?
- जहाज के लंगर: अक्सर बड़े जहाजों के भारी-भरकम लंगर (Anchors) गलती से इन केबल्स को काट देते हैं।
- मरम्मत की चुनौती: समुद्र के 8000 मीटर नीचे तार जोड़ना दुनिया के सबसे मुश्किल इंजीनियरिंग कामों में से एक है। इसके लिए रोबोटिक पनडुब्बियों का इस्तेमाल होता है।
3. ₹4000 करोड़ की एक ‘इंटरनेट लाइन’
इंटरनेट का असली सच इसकी कीमत में छिपा है। एक महाद्वीप से दूसरे महाद्वीप तक केबल बिछाने का खर्च करीब ₹2000 करोड़ से ₹4000 करोड़ तक आता है। यही कारण है कि अब गूगल, फेसबुक (Meta) और अमेज़न जैसी कंपनियां खुद की प्राइवेट केबल्स बिछा रही हैं ताकि वे इंटरनेट पर अपना कब्ज़ा जमा सकें।
4. स्पाई गेम: क्या इंटरनेट की तारें टैप की जा सकती हैं?

खुफिया एजेंसियों के लिए इंटरनेट जासूसी का एक जरिया है। एडवर्ड स्नोडेन ने खुलासा किया था कि कुछ देशों की खुफिया एजेंसियां समुद्र के नीचे ही इन केबल्स में ‘बग’ या ‘सेंसर’ लगाकर डेटा चोरी करने की कोशिश करती हैं। यह एक साइलेंट ‘साइबर वॉर’ है जो समुद्र की गहराइयों में लड़ा जा रहा है।
5. भविष्य: स्टारलिंक (Starlink) और लेजर बीम

एलन मस्क की कंपनी Starlink अब तारों के इस जंजाल को खत्म करना चाहती है।
- स्पेस इंटरनेट: अंतरिक्ष में हजारों सैटेलाइट्स एक-दूसरे को ‘लेजर बीम’ के जरिए डेटा भेजेंगे।
- फायदा: इससे समुद्र के नीचे केबल बिछाने और उनके टूटने का डर खत्म हो जाएगा। लेकिन फिलहाल, केबल इंटरनेट ही सबसे सस्ता और तेज है।
आने वाले समय में इंटरनेट का असली सच पूरी तरह बदलने वाला है। एलन मस्क की कंपनी Starlink अंतरिक्ष में हजारों छोटे सैटेलाइट्स का जाल बिछा रही है।
स्टारलिंक (Starlink) क्या है?
यह ‘लो अर्थ ऑर्बिट’ (LEO) सैटेलाइट्स का ग्रुप है। ये सैटेलाइट्स जमीन के काफी करीब होते हैं, जिससे इंटरनेट की स्पीड केबल जैसी ही मिल सकती है। इसका सबसे बड़ा फायदा उन इलाकों को होगा जहाँ केबल बिछाना नामुमकिन है, जैसे ऊंचे पहाड़ या गहरे जंगल।
Li-Fi: बल्ब से चलेगा इंटरनेट?
भविष्य में हम Wi-Fi की जगह Li-Fi का इस्तेमाल कर सकते हैं। इसमें आपके कमरे में लगा LED बल्ब डेटा ट्रांसफर करेगा। इसकी स्पीड Wi-Fi से 100 गुना ज्यादा हो सकती है।
इंटरनेट का असली सच: सैटेलाइट बनाम केबल
अक्सर लोग पूछते हैं कि जब हमारे पास सैटेलाइट है, तो हम तारों पर निर्भर क्यों हैं?
| फीचर | ऑप्टिक फाइबर केबल | सैटेलाइट (जैसे Starlink) |
| स्पीड | बहुत ज्यादा (Gbps/Tbps) | केबल के मुकाबले कम |
| लेटेन्सी (Delay) | लगभग ना के बराबर | थोड़ा ज्यादा (दूरी की वजह से) |
| लागत | बिछाने में महंगी, चलाने में सस्ती | बहुत महंगी टेक्नोलॉजी |
| विश्वसनीयता | मौसम का असर नहीं होता | खराब मौसम में सिग्नल कमजोर |
भारत और इंटरनेट का भविष्य
भारत में भी इंटरनेट तेजी से बदल रहा है। रिलायंस जियो और एयरटेल जैसी कंपनियां अब सीधे घरों तक फाइबर (FTTH) पहुँचा रही हैं। भारत सरकार भी अंडमान निकोबार और लक्षद्वीप जैसे द्वीपों तक समुद्र के नीचे केबल बिछा चुकी है, ताकि देश के कोने-कोने तक हाई-स्पीड इंटरनेट पहुँच सके।
इंटरनेट के बारे में 5 हैरान करने वाले तथ्य
| तथ्य | जानकारी |
| बाल जितनी पतली | अंदर की मुख्य फाइबर तार आपके सिर के बाल जितनी ही पतली होती है। |
| लाइट की रफ़्तार | डेटा लाइट की शक्ल में $200,000$ किलोमीटर प्रति सेकंड की रफ़्तार से दौड़ता है। |
| गहराई | ये केबल्स समुद्र में उतनी गहराई पर हैं जितना ऊंचा ‘माउंट एवरेस्ट’ है। |
| प्रेशर | केबल पर समुद्र के पानी का दबाव इतना होता है जैसे आपके हाथ पर 50 हाथी खड़े हों। |
| बैकअप | दुनिया में हर रूट के लिए कम से कम 2-3 बैकअप केबल्स हमेशा एक्टिव रहती हैं। |
जब आप अपने फोन पर ‘सच का समय’ की यह रिपोर्ट पढ़ रहे हैं, तो याद रखिए कि यह जानकारी हजारों मील दूर किसी सर्वर से निकलकर, शार्क के हमलों से बचते हुए और समुद्र की गहराइयों को चीरते हुए आप तक पहुँची है। इंटरनेट विज्ञान और इंसान की जिद्द का एक बेमिसाल संगम है।

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