नई दिल्ली/वॉशिंगटन/तेहरान: अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच छिड़ी जंग आज 15वें दिन में प्रवेश कर गई है। पूरी दुनिया की नजरें इस वक्त फारस की खाड़ी (Persian Gulf) पर टिकी हैं, जहाँ समंदर की लहरों पर बारूद की गंध तैर रही है। इस तनावपूर्ण माहौल के बीच भारत के लिए एक ऐसी खबर आई है जिसने करोड़ों भारतीयों की रसोई की चिंता को थोड़ा कम कर दिया है।
🚢 भारतीय जहाज ‘शिवालिक’ की जांबाजी: होर्मुज से सुरक्षित वापसी
भारत का विशालकाय गैस टैंकर जहाज शिवालिक (INS Shivalik – LPG Tanker) शुक्रवार रात को दुनिया के सबसे खतरनाक समुद्री रास्ते ‘होर्मुज स्ट्रेट’ को सुरक्षित पार करने में कामयाब रहा। शिपिंग कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया का यह जहाज 55,000 टन LPG लाने की क्षमता रखता है।

क्यों था खतरा? होर्मुज स्ट्रेट इस वक्त युद्ध का अखाड़ा बना हुआ है। मरीनट्रैफिक वेबसाइट के अनुसार, यह जहाज 7 मार्च को कतर से रवाना हुआ था। कतर और ईरान के बीच के इस संकरे समुद्री रास्ते पर ईरानी मिसाइलों और अमेरिकी ड्रोन का पहरा है। अगर इस जहाज को जरा सी भी आंच आती, तो भारत में रसोई गैस का संकट कई गुना बढ़ सकता था। लेकिन भारतीय जांबाज चालक दल इसे सुरक्षित बाहर निकाल लाया।
ट्रम्प का बड़ा दावा: ईरान का खार्ग आइलैंड सैन्य ठिकाना तबाह
एक तरफ भारत का जहाज सुरक्षित निकला, तो दूसरी तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान को अब तक का सबसे बड़ा जख्म देने का दावा किया है। ट्रम्प ने घोषणा की है कि अमेरिकी सेना ने ईरान के खार्ग आइलैंड (Kharg Island) पर स्थित सैन्य ठिकानों को पूरी तरह मटियामेट कर दिया है।
खार्ग आइलैंड क्यों है खास? ईरान के लिए यह आइलैंड उसकी रीढ़ की हड्डी है। ईरान के कुल कच्चे तेल के निर्यात का 80 से 90 प्रतिशत हिस्सा इसी खार्ग आइलैंड से होकर गुजरता है। ट्रम्प ने सीधे शब्दों में चेतावनी दी है कि यदि ईरान अपनी हरकतों से बाज नहीं आया, तो अमेरिका उसके पूरे ‘ऑयल इन्फ्रास्ट्रक्चर’ को राख में तब्दील कर देगा।
भारत पर क्या होगा असर?
पिछले कुछ दिनों से हरियाणा के करनाल, हिसार और गुरुग्राम जैसे शहरों में गैस की किल्लत और एजेंसियों के बाहर लंबी कतारें देखी जा रही थीं। जहाज शिवालिक का सुरक्षित निकलना इस बात का संकेत है कि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए हर संभव जोखिम उठा रहा है। हालांकि, ट्रम्प की ‘तेल ठिकानों को उड़ाने’ वाली धमकी ने वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आग लगा दी है, जिसका सीधा असर आने वाले दिनों में भारत के आम आदमी की जेब पर पड़ सकता है।
क्या यह महायुद्ध की शुरुआत है?
आज युद्ध का 15वां दिन है। एक तरफ ईरान के नए सुप्रीम लीडर मुजतबा खामेनेई के घायल होने की खबरें हैं, तो दूसरी तरफ अमेरिका अब सीधे ईरान के तेल खजानों पर निशाना साध रहा है। लेबनान में इजराइली टैंकों की गर्जना और फारस की खाड़ी में गिरती मिसाइलें चीख-चीख कर कह रही हैं कि दुनिया एक बड़े संकट की ओर बढ़ रही है।
💡 ‘सच्च का समय’ का नजरिया
इस खबर का सबसे बड़ा पहलू यह है कि भारत ने युद्ध के मैदान में भी अपने हितों की रक्षा की है। लेकिन ट्रम्प की आक्रामकता ने इस युद्ध को उस मोड़ पर पहुँचा दिया है जहाँ से समझौता अब बहुत मुश्किल लगता है। अगर ईरान के तेल ठिकानों पर और हमले होते हैं, तो दुनिया भर में गैस और पेट्रोल के दाम आसमान छू सकते हैं।
🔴 कड़वा सच: सिर्फ एक ‘शिवालिक’ ही नहीं, समंदर के ‘डेथ जोन’ में फंसे हैं दर्जनों भारतीय जहाज; सरकार की बढ़ी चिंता
मिडिल ईस्ट में मचे कोहराम के बीच जहाँ एक ओर भारतीय गैस टैंकर ‘शिवालिक’ के सुरक्षित निकलने पर राहत जताई जा रही है, वहीं दूसरी ओर एक ऐसी सच्चाई भी है जो देश की चिंता बढ़ा रही है। भारत सरकार की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, फारस की खाड़ी और लाल सागर (Red Sea) के आसपास के इलाकों में भारत के कई कमर्शियल जहाज इस वक्त फंसे हुए हैं। ये वो इलाके हैं जिन्हें अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ‘डेथ जोन’ घोषित किया जा चुका है।
🚢 समंदर में फंसे ‘हिंदुस्तानी’: आखिर क्या है हकीकत?
सरकार ने संसद और आधिकारिक बयानों में संकेत दिया है कि कई भारतीय क्रू मेंबर्स और कार्गो जहाज ईरान-इजराइल युद्ध की सीधी मार झेल रहे हैं।
- होर्मुज और लाल सागर का घेरा: ईरान और अमेरिका की आपसी गोलाबारी के कारण कई जहाजों को सुरक्षित ठिकानों (Anchorage) पर रुकने को कहा गया है। ये जहाज न तो आगे बढ़ पा रहे हैं और न ही सुरक्षित वापस लौट पा रहे हैं।
- डार्क मोड में सफर: जो जहाज वहां से निकलने की कोशिश कर रहे हैं, उन्हें अपना GPS और लोकेशन सिस्टम (AIS) बंद करना पड़ रहा है ताकि वे मिसाइलों का निशाना न बनें। लेकिन यह ‘डार्क मोड’ उन्हें और भी ज्यादा जोखिम में डाल देता है क्योंकि इससे दूसरे जहाजों से टकराने का खतरा बढ़ जाता है।
- सैकड़ों नाविकों की जान दांव पर: इन जहाजों पर काम करने वाले ज्यादातर नाविक भारतीय हैं। उनके परिवारों में इस वक्त मातम जैसा माहौल है क्योंकि कई दिनों तक उनसे संपर्क नहीं हो पाता।
⚠️ सरकार के दावे और बढ़ती चुनौतियां
सरकार ने माना है कि युद्ध के कारण सप्लाई चैन बुरी तरह प्रभावित हुई है।
- इंश्योरेंस का बढ़ा बोझ: जो जहाज इन इलाकों से गुजर रहे हैं, उनका इंश्योरेंस (War Risk Premium) 1000% तक बढ़ गया है। कई कंपनियों ने अपने हाथ पीछे खींच लिए हैं।
- रूट बदलने की मजबूरी: जहाजों को अब हजारों मील का चक्कर काटकर ‘केप ऑफ गुड होप’ (अफ्रीका के नीचे से) होकर आना पड़ रहा है। इससे माल पहुँचने में 15 से 20 दिन की देरी हो रही है और किराया दोगुना हो गया है।
📉 भारत पर इसका सीधा असर
यह केवल जहाजों के फंसने की बात नहीं है। इन जहाजों में भारत के लिए जरूरी कच्चा तेल, दालें, और खाद (Fertilizers) लदे हुए हैं।
- महंगाई का खतरा: अगर ये जहाज लंबे समय तक फंसे रहे, तो भारत में पेट्रोल-डीजल के साथ-साथ खाने-पीने की चीजों के दाम भी बढ़ना तय है।
- गैस की किल्लत: हरियाणा में जो गैस की कमी आप देख रहे हैं, उसका एक बड़ा कारण यही है कि कई गैस टैंकर कतर और ओमान के बंदरगाहों पर फंसे हुए हैं और सुरक्षा की गारंटी न मिलने तक वहां से हिल नहीं रहे हैं।
💡 निष्कर्ष: विज्ञापन नहीं, सुरक्षा चाहिए
एक जहाज के निकलने पर जश्न मनाना ठीक है, लेकिन प्रशासन को उन सैकड़ों नाविकों और दर्जनों जहाजों की भी सुध लेनी होगी जो इस वक्त ईरान की मिसाइलों और अमेरिकी ड्रोन के बीच फँसे हैं। ‘सच्च का समय’ की यह रिपोर्ट उन परिवारों की आवाज है जिनके अपने इस वक्त समंदर के बीचों-बीच मौत से जूझ रहे हैं।

