साल 2026 में होली की तारीखें इस प्रकार हैं:
- होलिका दहन: 3 मार्च 2026 (मंगलवार)
- धुलेंडी (रंगों वाली होली): 4 मार्च 2026 (बुधवार)
होली क्यों मनाई जाती है? (धार्मिक और वैज्ञानिक कारण)
- मुख्य रूप भगवान बुद्ध के जीवन से और भक्त प्रहलाद की रक्षा और असुर राज हिरण्यकश्यप की बहन होलिका के अंत की खुशी में मनाया जाता है।
- ऋतु परिवर्तन: वैज्ञानिक दृष्टिकोण से, यह समय दो ऋतुओं (सर्दी और गर्मी) का संधिकाल होता है। होलिका की अग्नि वातावरण के बैक्टीरिया को खत्म करती है और अबीर-गुलाल शरीर की थकान और सुस्ती दूर करने का काम करते हैं।
- सामजिक समरसता: जैसा कि एंथ्रोपॉलॉजिस्ट मैककिम मैरियट ने कहा, यह त्योहार ऊंच-नीच और पुराने मनमुटाव को खत्म कर समाज को एक सूत्र में पिरोने का काम करता है।
होली से जुड़ी पौराणिक कहानियाँ
1.महात्मा बुद्ध और ‘मन की होली’ (प्रेरक किस्सा)
भगवान बुद्ध के जीवन का यह प्रसंग हमें होली के असली रंग यानी ‘करुणा’ के बारे में बताता है:
एक बार वैशाली नगरी में वसंत उत्सव (होली) की तैयारी चल रही थी। नगर की प्रसिद्ध नर्तकी आम्रपाली ने बुद्ध को भोजन पर आमंत्रित किया। वहां मौजूद राजकुमारों ने बुद्ध से कहा, “भगवन, आप एक नर्तकी के घर क्यों जा रहे हैं? हमारे साथ शाही रंगों का उत्सव मनाइए।”

बुद्ध ने मुस्कुराकर कहा— “सच्चा उत्सव बाहर के रंगों का नहीं, हृदय की शुद्धि का होता है।”
जब बुद्ध आम्रपाली के घर पहुंचे, तो उनके शांत और पवित्र व्यक्तित्व को देखकर आम्रपाली का हृदय परिवर्तन हो गया। उसने बुद्ध के चरणों में जल अर्पित किया और कहा— “आज तक मैंने दुनिया को बाहरी सुंदरता दिखाई, पर आज आपके ज्ञान ने मेरे भीतर की सारी कड़वाहट धो दी है।” बुद्ध ने वहां संदेश दिया कि होली की असली अग्नि वह है जो हमारे भीतर के अहंकार और ईर्ष्या को जला दे। उस दिन वैशाली ने रंगों से नहीं, बल्कि ‘प्रेम और क्षमा’ से होली मनाई।
2. ढोंढा राक्षसी की कहानी (श्रीकृष्ण और युधिष्ठिर संवाद)

भविष्य पुराण के अनुसार, राजा युधिष्ठिर ने जब श्रीकृष्ण से फाल्गुन पूर्णिमा के उत्सव के बारे में पूछा, तब प्रभु ने ढोंढा राक्षसी का जिक्र किया था।
- कहानी: राजा रघु के राज्य में ढोंढा नाम की एक राक्षसी थी, जिसे भगवान शिव से वरदान प्राप्त था कि उसे कोई भी अस्त्र, शस्त्र, गर्मी, सर्दी या वर्षा नहीं मार सकती। लेकिन उसे एक श्राप भी था कि वह बच्चों की हंसी और शोर-शराबे को सहन नहीं कर पाएगी।
- अंत: फाल्गुन पूर्णिमा के दिन बच्चों ने लकड़ियाँ इकट्ठी कर आग जलाई, मंत्रोच्चार किया और खूब शोर मचाया। इस शोर और हंसी-ठिठोली से डरकर ढोंढा भाग गई। तभी से बच्चों की रक्षा के लिए ‘होलिका दहन’ और शोर मचाने की परंपरा शुरू हुई।
3. भक्त प्रहलाद और होलिका
यह सबसे प्रचलित कहानी है। असुर राजा हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रहलाद भगवान विष्णु का परम भक्त था। हिरण्यकश्यप इसे रोकना चाहता था। उसने अपनी बहन होलिका को प्रहलाद को लेकर आग में बैठने को कहा, क्योंकि होलिका को वरदान था कि आग उसे जला नहीं सकती। लेकिन भगवान की कृपा से प्रहलाद बच गया और होलिका जलकर राख हो गई।
4. कामदेव के पुनर्जन्म की कथा
दक्षिण भारत में माना जाता है कि इसी दिन भगवान शिव ने अपनी तीसरी आंख से कामदेव को भस्म कर दिया था, जिन्होंने शिव की तपस्या भंग करने की कोशिश की थी। बाद में रति की प्रार्थना पर शिव ने कामदेव को पुनर्जीवित किया। प्रेम के देवता के वापस आने की खुशी में होली मनाई जाती है।
5. राधा-कृष्ण की फाग
ब्रज में मान्यता है कि भगवान कृष्ण ने अपने सांवले रंग और राधा के गोरे रंग की असमानता को खत्म करने के लिए राधा के चेहरे पर रंग लगा दिया था। यहीं से रंगों वाली होली की शुरुआत हुई।

🌾 किसानों के लिए महत्व: ‘नवान्न इष्टि’ यज्ञ
प्राचीन काल में होली को ‘नवान्न इष्टि’ कहा जाता था। किसान अपनी नई रबी की फसल (गेहूं, चना, जौ) की बालियों को होलिका की पवित्र अग्नि में सेंकते थे और उसे प्रसाद के रूप में बांटते थे। आज भी कई गाँवों में होलिका की अग्नि में ‘हौला’ (भुनी हुई बालियां) खाने की परंपरा है।

