IRCTC Food Menu Scam Exposed;Vande Bharat Tejas Express

वंदे भारत और तेजस में ‘जहरीला’ खाना: करोड़ों की लूट और यात्रियों पर हमला; पढ़ें पूरी पड़ताल

वंदे भारत और तेजस जैसी प्रीमियम ट्रेनों में सफर करने वाले यात्री आज खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। जिस ‘वर्ल्ड क्लास’ सर्विस के नाम पर टिकट के साथ खाने का एडवांस पेमेंट लिया जाता है, हकीकत में वह खाना न केवल घटिया है, बल्कि यात्रियों की सेहत के साथ एक खतरनाक खिलवाड़ भी है।

1. सिस्टम की बड़ी नाकामी: शिकायतों का अंबार

साल 2024-25 में IRCTC को खराब खाने की 6,645 शिकायतें मिलीं। इनमें बासी दाल, पत्थर जैसी सख्त रोटियां और अधपके चावल जैसी गंभीर समस्याएं शामिल थीं।

  • हैरान करने वाली बात: शिकायतों के बाद भी सप्लायर्स पर कोई सख्त कार्रवाई नहीं होती। सिर्फ 1,341 मामलों में जुर्माना लगा, जबकि बाकी को चेतावनी देकर छोड़ दिया गया।

2. कौन है असली जिम्मेदार?

1. IRCTC: मोनोपॉली (एकाधिकार) को बढ़ावा देना IRCTC ट्रेनों में खाना परोसने का जिम्मा निजी कंपनियों को देता है। नियम तो यह है कि काम खराब हो तो ठेका रद्द किया जाए, लेकिन असलियत इसके उलट है:

  • एक ही ग्रुप का कब्जा: प्रीमियम ट्रेनों (राजधानी, वंदे भारत) के अधिकतर ठेके एक ही बड़े ग्रुप (आरके ग्रुप) के पास हैं। 265 ट्रेनों में से 218 का जिम्मा इसी ग्रुप के पास है।
  • कंपटीशन खत्म: जब एक ही कंपनी के पास सब कुछ होगा, तो उसे सुधार करने की जरूरत ही महसूस नहीं होती। शिकायतों के बाद भी इन कंपनियों को 2-2 साल का एक्सटेंशन मिल जाता है।

2. ठेका लेने वाली कंपनियां: टेंडर पाने की ‘अंधी दौड़’ कंपनियां टेंडर हासिल करने के लिए रेलवे द्वारा तय न्यूनतम कीमत से 70% ज्यादा बोली लगा देती हैं।

  • खर्च का बोझ: मान लीजिए किसी ट्रेन का टेंडर ₹100 का है, तो कंपनी उसे ₹170 में ले लेती है।
  • नुकसान की भरपाई: अब इस भारी-भरकम फीस को भरने के बाद कंपनी के पास खाना बनाने और स्टाफ को सैलरी देने के लिए बहुत कम पैसा बचता है। इसी घाटे को पूरा करने के लिए वे सड़ी हुई सब्जियां, घटिया तेल और मात्रा में कटौती करना शुरू कर देते हैं।

3. रेलवे बोर्ड: कागजी नियम और ढीली निगरानी नीति बनाने और निगरानी की मुख्य जिम्मेदारी रेलवे बोर्ड की है, लेकिन यहाँ भी भारी लापरवाही है:

  • सीलिंग लिमिट का खात्मा: 2010 तक नियम था कि एक ठेकेदार को कुल ठेकों का 10% से ज्यादा नहीं मिलेगा। 2017 में रेलवे ने यह ‘लिमिट’ ही हटा दी, जिससे बड़े ग्रुप्स का ‘कैटरिंग माफिया’ तैयार हो गया।
  • एक्शन की कमी: रेलवे बोर्ड को पता है कि कंपनियां नियम तोड़ रही हैं, फिर भी कड़े एक्शन के बजाय सिर्फ चेतावनी देकर छोड़ दिया जाता है।

3. हक मांगने पर यात्रियों के साथ मारपीट

पड़ताल में सामने आया कि यात्री सिर्फ घटिया खाने से ही परेशान नहीं हैं, बल्कि पैंट्री स्टाफ की गुंडागर्दी का भी शिकार हो रहे हैं।

  • मई 2025 का मामला: हेमकुंट एक्सप्रेस में ₹15 की पानी की बोतल ₹20 में बेचने की शिकायत करने पर एक यात्री (विशाल) को स्टाफ ने बुरी तरह पीटा। रेलवे ने बाद में ₹5 लाख का जुर्माना लगाया और FIR दर्ज की।
  • अंडमान एक्सप्रेस: ₹20 के ओवरचार्जिंग विवाद में यात्री को बेल्ट और डंडों से पीटा गया।

4. मुनाफे का गणित: एक कटोरी दाल से करोड़ों की कमाई

ठेकेदार थाली के एक-एक आइटम में कटौती कर मोटा मुनाफा कमाते हैं। अगर एक ट्रेन में रोज 1,000 यात्री सफर करते हैं और हर थाली से सिर्फ ₹5 का पनीर या दाल का आइटम कम कर दिया जाए, तो साल भर में यह आंकड़ा करोड़ों में पहुँच जाता है।

5. IRCTC का कबूलनामा

IRCTC ने खुद रेलवे मंत्रालय को लिखे पत्र (28 नवंबर 2025) में माना है कि:

  • सीलिंग लिमिट न होने से मोनोपॉली बढ़ी है।
  • ज्यादा लाइसेंस फीस के दबाव में वेंडर खाने की क्वालिटी से समझौता कर रहे हैं और नियमों को ताक पर रख रहे हैं।

निष्कर्ष

रेलवे की यह प्रीमियम सर्विस अब केवल नाम की रह गई है। एडवांस पेमेंट लेने के बावजूद ‘सड़ा हुआ’ खाना परोसना और शिकायत करने पर मारपीट करना, रेल मंत्रालय की मॉनिटरिंग पर बड़े सवाल खड़े करता है।