वोटर लिस्ट सुधार के दबाव में BLO ने तोड़ा दम, परिवारों में मातम
एक तरफ सुप्रीम कोर्ट में वोटर लिस्ट की शुद्धता पर जंग छिड़ी है, तो दूसरी तरफ ज़मीनी स्तर पर इसे लागू करने वाले BLO (Booth Level Officers) मौत के साये में काम करने को मजबूर हैं। चुनाव आयोग के ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (SIR) के भारी काम और अधिकारियों के दबाव ने अब मासूम कर्मचारियों की जान लेना शुरू कर दिया है।
काम का बोझ या ‘डेथ वारंट’?
खबरों के मुताबिक, पिछले कुछ हफ्तों में कई राज्यों से ड्यूटी के दौरान BLO की मौत की दुखद खबरें सामने आई हैं। ये वे लोग हैं (ज़्यादातर प्राइमरी टीचर या आंगनबाड़ी कार्यकर्ता), जिन्हें अपनी नियमित ड्यूटी के बाद घर-घर जाकर हज़ारों वोटर्स के दस्तावेज जाँचने का काम सौंपा गया है।
मौत की वजह बने ये 3 बड़े कारण:
- असंभव डेडलाइन: लाखों नाम जाँचने के लिए चुनाव आयोग ने बहुत ही कम समय दिया, जिससे कर्मचारी दिन-रात काम करने को मजबूर हुए।
- अधिकारियों की धमकी: रिपोर्ट में देरी होने पर BLO को सस्पेंशन (निलंबन) और सैलरी रोकने की धमकियां दी जा रही हैं।
- मानसिक तनाव: जनता के गुस्से और ऊपर से अधिकारियों के दबाव के बीच पिस रहे इन कर्मचारियों को दिल का दौरा (Heart Attack) और ब्रेन हैमरेज जैसी गंभीर समस्याएं हो रही हैं।
शिक्षक संगठनों का फूटा गुस्सा
शिक्षक संगठनों का कहना है कि “हम शिक्षक हैं, कोई मशीन नहीं।” उनका आरोप है कि चुनाव आयोग एक तरफ 1.25 करोड़ लोगों की लिस्ट सुधारने की बात कर रहा है, लेकिन उन हाथों की सुध नहीं ले रहा जो ये काम कर रहे हैं। कई घरों के चिराग इस चुनावी ड्यूटी की वजह से बुझ गए हैं।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का असर
अब जब सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि “कोई भी शक्ति अनियंत्रित नहीं हो सकती”, तो इसमें उन कर्मचारियों का दर्द भी शामिल है जो इस अनियंत्रित दबाव में अपनी जान गंवा रहे हैं। कोर्ट ने साफ संकेत दिए हैं कि नियम इंसानों के लिए होने चाहिए, न कि इंसान नियमों की बलि चढ़ जाए

