SUPREME COURT NEWS TODAY

यह एक ऐसी खबर है जो देश की राजनीति और आम जनता की सोच को हिलाकर रख देगी। सुप्रीम कोर्ट की ये टिप्पणियां सीधे तौर पर सरकारों की ‘मुफ्तखोरी’ वाली राजनीति पर कड़ा प्रहार हैं

सुप्रीम कोर्ट का तीखा प्रहार: “सब कुछ फ्री मिलेगा तो लोग काम क्यों करेंगे? क्या हम परजीवियों का देश बनाना चाहते हैं?”

नई दिल्ली: देश में बढ़ते ‘फ्रीबीज कल्चर’ (मुफ्त की रेवड़ियां) पर सुप्रीम कोर्ट ने आज ऐसी टिप्पणी की है, जो आने वाले चुनावों में बड़ा मुद्दा बन सकती है। कोर्ट ने साफ लफ्जों में सरकारों को चेतावनी दी है कि मुफ्त बिजली, पानी और खाने की आदत देश के विकास को गर्त में धकेल रही है।

CJI सूर्यकांत की दो टूक: “आत्मसम्मान छीन रही हैं ये योजनाएं”

तमिलनाडु पावर डिस्ट्रीब्यूशन कॉर्पोरेशन की एक याचिका पर सुनवाई करते हुए CJI सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की बेंच ने सरकारों की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठाए। कोर्ट ने कहा:

“अगर सरकार लोगों को सुबह से शाम तक फ्री खाना, गैस और बिजली परोसती रहेगी, तो लोग काम क्यों करेंगे? काम करने की आदत ही खत्म हो जाएगी। क्या हम ऐसा ही देश बनाना चाहते हैं?”

मुफ्तखोरी बनाम तुष्टीकरण: कोर्ट के 3 बड़े सवाल

  1. अमीर-गरीब का फर्क क्यों नहीं?: कोर्ट ने पूछा कि जो लोग बिजली का बिल दे सकते हैं, उन्हें भी फ्री बिजली देना क्या केवल ‘वोटों का तुष्टीकरण’ नहीं है? कल्याणकारी योजनाएं केवल उनके लिए होनी चाहिए जो सच में असमर्थ हैं।
  2. रोजगार पर फोकस क्यों नहीं?: बेंच ने कहा कि सरकार का काम लोगों को बैसाखी देना नहीं, बल्कि उन्हें रोजगार देना है ताकि वे इज्जत और आत्मसम्मान के साथ कमा सकें और अपना बिल खुद भर सकें।
  3. चुनाव के समय ही क्यों याद आता है फ्री?: कोर्ट ने तंज कसते हुए पूछा कि अचानक चुनाव के नजदीक ही ऐसी योजनाओं की बाढ़ क्यों आती है? यह देश के विकास में सबसे बड़ी रुकावट है।

देश कर्ज में, नेता ‘उदारता’ में!

सुप्रीम कोर्ट ने चिंता जताते हुए कहा कि भारत के ज्यादातर राज्य राजस्व घाटे (Debt) में डूबे हुए हैं। इसके बावजूद नेता विकास को नजरअंदाज कर मुफ्त की घोषणाएं कर रहे हैं। कोर्ट ने केंद्र सरकार और अन्य पक्षों को नोटिस जारी कर पूछा है कि बिना किसी शर्त के ऐसी योजनाएं कैसे लागू की जा रही हैं।

“परजीवियों की जमात खड़ी हो रही है”

यह पहली बार नहीं है जब कोर्ट ने नाराजगी जताई हो। इससे पहले फरवरी 2025 में भी कोर्ट ने सख्त लहजे में कहा था कि:

“आप मुफ्त राशन और पैसे देकर समाज में परजीवियों (Parasites) की जमात खड़ी कर रहे हैं। लोग अब काम ही नहीं करना चाहते।”


पॉलिटिकल इम्पैक्ट: असम का उदाहरण

जहाँ एक तरफ सुप्रीम कोर्ट इसे गलत बता रहा है, वहीं जमीन पर ये स्कीम्स गेम-चेंजर साबित हो रही हैं। असम का उदाहरण देते हुए रिपोर्ट बताती है कि चुनाव से पहले मुस्लिम महिलाएं भी BJP सरकार की योजनाओं से इतनी खुश हैं कि वे खुलेआम ‘हिमंता जिंदाबाद’ के नारे लगा रही हैं। अब बड़ा सवाल यह है कि ‘विकास’ जीतेगा या ‘फ्रीबीज’?