चाबहार पोर्ट का ‘सच’:

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चाबहार पोर्ट को लेकर छिड़ी बहस के बीच की सच्चाई को हम 3 बड़े पहलुओं से समझ सकते हैं:

1. क्या भारत ने कंट्रोल छोड़ दिया है? (सच्चाई: ‘हाँ’ भी और ‘ना’ भी)

  • सच्चाई यह है कि भारत ने आधिकारिक तौर पर पोर्ट नहीं छोड़ा है, लेकिन काम की रफ्तार बेहद धीमी हो गई है।
  • भारत और ईरान के बीच 2018 में जो 10 साल का लॉन्ग-टर्म समझौता होना था, वह अमेरिका के प्रतिबंधों के डर से बार-बार टलता रहा। वर्तमान में भारत वहां केवल ‘शॉर्ट-टर्म’ (अल्पकालिक) समझौतों के आधार पर काम कर रहा है, जो हर कुछ महीनों में रिन्यू करने पड़ते हैं। इससे निवेश की सुरक्षा पर सवाल उठना लाजिमी है।

2. ट्रम्प फैक्टर और अमेरिकी दबाव का सच

  • डोनाल्ड ट्रम्प की ‘मैक्सिमम प्रेशर’ नीति का उद्देश्य ईरान की अर्थव्यवस्था को बर्बाद करना है। अमेरिका चाहता है कि कोई भी देश ईरान के साथ बड़े प्रोजेक्ट न करे।
  • सच यह है कि भारत को चाबहार के लिए जो ‘छूट’ (Waiver) मिली है, वह सिर्फ इसलिए है क्योंकि यह अफगानिस्तान को मानवीय मदद भेजने का रास्ता है। अगर कल को अमेरिका यह छूट खत्म कर देता है, तो भारत की कोई भी कंपनी (जैसे टाटा या अडानी) वहां निवेश नहीं करेगी क्योंकि उन पर भी अमेरिकी प्रतिबंध लग सकते हैं। यही वो दबाव है जिसका जिक्र विपक्ष कर रहा है।

3. 1100 करोड़ रुपये का सच

  • भारत ने अब तक वहां इंफ्रास्ट्रक्चर और क्रेन जैसी मशीनों पर करोड़ों खर्च किए हैं। लेकिन सच यह है कि इस पोर्ट का इस्तेमाल उस लेवल पर नहीं हो पाया जितना सोचा गया था।
  • चीन का ग्वादर पोर्ट (पाकिस्तान में) बहुत तेजी से विकसित हुआ है, जबकि चाबहार राजनीतिक अनिश्चितता की भेंट चढ़ गया है। अगर वहां व्यापार नहीं बढ़ता, तो निवेश किया गया पैसा ‘डेड इन्वेस्टमेंट’ (मृत निवेश) बन सकता है।

सच का समय न्यूज़  का निष्कर्ष

सच्चाई यह है कि भारत एक बहुत ही मुश्किल स्थिति में फंसा है:

  1. अगर भारत चाबहार छोड़ता है, तो चीन तुरंत वहां कब्जा कर लेगा (जैसा उसने श्रीलंका के हंबनटोटा में किया)।
  2. अगर भारत वहां तेजी से काम करता है, तो अमेरिका (ट्रम्प) भारत पर भारी व्यापारिक प्रतिबंध या टैरिफ लगा सकता है।

निष्कर्ष: सरकार का ‘इनकार’ अपनी जगह सही है कि प्रोजेक्ट बंद नहीं हुआ है, लेकिन कांग्रेस का ‘आरोप’ भी पूरी तरह गलत नहीं है कि अमेरिकी दबाव में प्रोजेक्ट की हालत पतली है। भारत फिलहाल “देखो और इंतजार करो” की नीति अपना रहा है, ताकि ट्रम्प प्रशासन के साथ कोई बीच का रास्ता निकल सके।


आज का कड़वा सच: अंतरराष्ट्रीय राजनीति में ‘दोस्ती’ से बड़े ‘हित’ होते हैं। भारत के लिए चाबहार को बचाए रखना अब एक आर्थिक प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि एक बड़ी कूटनीतिक परीक्षा बन गया है।

Abhishek Ranga is the founder and editor-in-chief of Sach Ka Samay News. With a commitment to journalistic integrity, he focuses on delivering accurate, unbiased, and real-time news to the public. He oversees the digital strategy and content management for the portal, ensuring that every story meets the highest standards of reporting

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